मंगलवार, 29 मई 2012

माँ की डेहरी की याद

कभी घर की डेहरियों से
बुलाती माँ की याद
जब वो बाबू जी का
करती इंतज़ार रात भर /
और याद नज़र आती
सुबह की वो भरी-भरी
लाल आँखें , किसकी
सोचो.......
सोचो.......
याद आया ? अरे हाँ !
वो तो माँ होती थी /
आज भी दिमागों के
छल्लो में घूम रहा
वो हथपंखी , जो
माँ रात भर घुमती
और मैं बेखबर सोता ;
हर उस खबर से जो , माँ
को बहुत दूर सुनाई पड़ रही थी
जो मैं आज भी
नहीं सुन पा रहा
शायद ये वही फर्क है
जो माँ बचपन में
कभी गुस्से में , तो कभी
प्यार में ,
जताती थी ///  

तरन्नुम चार

१-; शोख हवाओं के परिंदों से
      कुछ कहना हम भूल गए
      वादी के इस नए मौसम से
      हम उड़ना 
भी आज भूल गए ///
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२-; अक्स तेरा आज भी जिंदा है कहीं
     फिर भी नामो- निशा तेरा 
दिखता नहीं कहीं 
     रोज़-रोज़ चलता हूँ तेरे रूखे साथ में 
     फिर भी तेरी पैमाइश होती नहीं कहीं ..////
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३-; लोग फिर से मुकम्मल जहाँ ढूंढ़ते है
      परिंदे फिर से नए मौसम का आशियाना
ढूंढ़ते है
      पर क्यूँ हम ज़िन्दगी के नए रास्तों पर
      फिर वही पुराना करवा ढूंढ़ते है ..///
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४-; हम जिस्म के दागों की दावा करते रहे
     फिर भी नए दाग लगते रहे
     ज़िन्दगी इसी कशमोकश में रही
     मौत से भी इसकी दावा न बनी
     लोग फिर कब्र पर भी आते रहे
     अब तो मिट्टी, मिट्टी से लड़ने लगी
     दरख्तों पर भी आज दाग लगने लगे 
     ज़िन्दगी गुज़र हरने में थी लगी
     कब्र की तहों से भी 
हारने लगे ////

राही

पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की
सोच समुन्दर सा गहरा था
कर्म की रेख नापती इसको
लगता कितनी दूर चलू मैं
सोच की गहरे ढूंढ़ चलू मैं
उस कर्म रेख की गहरी स्याही
अपने जीवन पर छोड़  चलू मैं /
पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की ....
  

रविवार, 20 मई 2012

आकर्षण Vs प्रेम


उस आकर्षण के पीछे
कितने पल का
मौन छिपा था
शायद
उसके मन:स्थल से
यही प्रश्न उभरता था /
क्यों छन भर में
वह उच्च पटल से
निम्न सतह पर होता ?
उच्चावच का यह रेखांकन
मस्तिष्क ह्रदय
संपर्क रेखा सी
अन्तःस्थल से मुक्त गगन का
स्पर्श गान सा
था लगता ;
उसके प्रति था
यह आकर्षण
या इसे
प्रेम का गान कहू ?

आपाधापी एवम प्रेम

आँखों में तस्सुउवर
पलकों में शिकायत
उनको क्या पता ?
हमको क्या जरुरत
दो पल - दो शब्दों
से
क्या होता ?
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
साथ की
एहसास की ज़रूरत
वह ख़ुशी
कुछ पाने की
वो गम
कुछ खोने का
एक पल में
सब लुटा देने का,
और
हमेशा के लिए
लुट जाने को
कुछ भी
न पास रखने को;
और
सबकुछ पा लेने की चाहत
ये सब
मैंने भी चाहा ,
पर क्या
इस जग में
मुमकिन है?
ये सुकून
प्यार ,
एहसास ,
सब बेगाने लगते है
आज की इस
भौतिकता में ,
पता नहीं
मस्तिष्क की छड्भंगुरता
ह्रदय की अरक्तता
ये सब
कब तक ?

शुक्रवार, 18 मई 2012

पहचान का प्रश्न



तू सब्र है मेरा
तू इम्तहा है मेरा
ऐ दिल तू बता भी दे
तू क्या है मेरा ////
तू दर्द भी है
तू दवा भी है
तू लहर भी है
तू है साहिल भी
तू कशमोकश है रातों की
तू निंदिया भी है राहतों की .
कैसी है ये बेखुदी तेरी
न चाहे भी तू धडकता है
ऐ मेरे नादा दिल
क्यों तू रह-रह के बरसता है ///
ऐ दिल तू बता भी दे
तू क्या है मेरा
तू सब्र है मेरा...या...तू है इम्तहा मेरा///
♥ ♥ ♥

जीवन और आकाल


कभी दिल ये दरिया था
आज न तो दरिया है और
न ही पानी ........
न ही गहराई ....
रह गया है तो मात्र
एक छिछला सा तलहट
जिसमे न जीवन है
और न अतीत के निशान...////