एक गहरे कोटरे वाली आँखे
और पिचके गाल
हाँथ में मजबूती से पकड़े हसियां
वो काट रही थी
अपने उदार की भूख को ,
चारों तरफ चरचराई धरती
जैसे उसके दन्तु पंक्तियों के बीच खाली जगहें
और नहरों में जैसे
उसकी चुचकी नसों वाली गर्दन
जो रह-रह कर फड़क रही थीं ,
अभी-अभी कुछ ने कहा है
गणतंत्र,
सम्प्रभु,
समाजवादी,
स्वतंत्र /
और पिचके गाल
हाँथ में मजबूती से पकड़े हसियां
वो काट रही थी
अपने उदार की भूख को ,
चारों तरफ चरचराई धरती
जैसे उसके दन्तु पंक्तियों के बीच खाली जगहें
और नहरों में जैसे
उसकी चुचकी नसों वाली गर्दन
जो रह-रह कर फड़क रही थीं ,
अभी-अभी कुछ ने कहा है
गणतंत्र,
सम्प्रभु,
समाजवादी,
स्वतंत्र /
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें