रविवार, 19 जुलाई 2015

एक गहरे कोटरे वाली आँखे 
और पिचके गाल 
हाँथ में मजबूती से पकड़े हसियां 
वो काट रही थी 
अपने उदार की भूख को ,
चारों तरफ चरचराई धरती
जैसे उसके दन्तु पंक्तियों के बीच खाली जगहें
और नहरों में जैसे
उसकी चुचकी नसों वाली गर्दन
जो रह-रह कर फड़क रही थीं ,
अभी-अभी कुछ ने कहा है
गणतंत्र, 

सम्प्रभु, 
समाजवादी, 
स्वतंत्र /

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