सई के किनारे बैठे हुए
बहते किनारों से डरता हूँ
खुद के डूब जाने का नहीं
बह जाने से जैसे सदियों से
बहते आ रहे हैं मुर्दे
माँ जब सुनती है कि
आज फिर बैठा था किनारे
कहती - बह गए हो
मैं बहना नहीं चाहता
क्योंकि मैं नहीं चाहता
कोई मुझे बहते देख
रखे अपने सिर पर हाथ
या होनी को करे
दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम ,
और जब भी मुझे कोई कहता
कि थोड़ा पखार लो पग ही
मैं बढ़ता अपना दाहिना पैर
और जैसे ही अंगूठे को
करता स्पर्श
मानो सई कह रही हो
तुम बह रहे हो
चाहे मेरे अंदर , या
मुझसे परे
और मैं बैठा रहता ///
खुद के डूब जाने का नहीं
बह जाने से जैसे सदियों से
बहते आ रहे हैं मुर्दे
माँ जब सुनती है कि
आज फिर बैठा था किनारे
कहती - बह गए हो
मैं बहना नहीं चाहता
क्योंकि मैं नहीं चाहता
कोई मुझे बहते देख
रखे अपने सिर पर हाथ
या होनी को करे
दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम ,
और जब भी मुझे कोई कहता
कि थोड़ा पखार लो पग ही
मैं बढ़ता अपना दाहिना पैर
और जैसे ही अंगूठे को
करता स्पर्श
मानो सई कह रही हो
तुम बह रहे हो
चाहे मेरे अंदर , या
मुझसे परे
और मैं बैठा रहता ///
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