बहुत-सी अजीब सी बातें
ज़िन्दगी को थोड़ा ज़्यादा करती हैं
पेड़ अपनी छाया को
महसूसता है अपने बीज होने में
नदी अपने प्रवाह को
पाती है समुन्द्र होने में
ईश्वर अपने दैवत्व को
मंडित करता है अनुचर होने में।
कुछ होने से पहले
कुछ होना पड़ता है
पल-प्रति-पल अपनी तथ्यात्मकता
चेतना की वर्तुल दिक्-कालिकता में
स्व को लगातार पाने
और झुठलाने के क्रम में
मृत्यु के निकट
खड़े होना अनुत्तरित
अभिशप्त जीवन की सार्थकता
प्रस्तुत होना है उसके लिए
जिसके समक्ष होकर
होना साकार होता है
क्योंकि अजीब सी बातें
हमेशा अजीब होती नहीं।
ज़िन्दगी को थोड़ा ज़्यादा करती हैं
पेड़ अपनी छाया को
महसूसता है अपने बीज होने में
नदी अपने प्रवाह को
पाती है समुन्द्र होने में
ईश्वर अपने दैवत्व को
मंडित करता है अनुचर होने में।
कुछ होने से पहले
कुछ होना पड़ता है
पल-प्रति-पल अपनी तथ्यात्मकता
चेतना की वर्तुल दिक्-कालिकता में
स्व को लगातार पाने
और झुठलाने के क्रम में
मृत्यु के निकट
खड़े होना अनुत्तरित
अभिशप्त जीवन की सार्थकता
प्रस्तुत होना है उसके लिए
जिसके समक्ष होकर
होना साकार होता है
क्योंकि अजीब सी बातें
हमेशा अजीब होती नहीं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें