गोपियाँ प्रेम की दीवानी थीं
शायद एक दीवाना भी था
उसी दीवाने को खोजता
मैं करता रहा परिक्रमा
वो मिला या नहीं
ये मुझे आज तक नहीं पता
पर सदियों से मुझे
मिलती रहीं गोपियाँ
जिनकी उम्र तरसती रही
त्रेता से कलयुग तक
मात्र एक वैध्यता के लिए,
अब तक तो अजर हो गई है
बिना किसी अमृत के
शायद नीलकंठ का आशीर्वाद है
वरना मरने के बाद
उनको सिंगार नहीं भाल मिला
और मिला जूट का थैला
जिसमें दफ़न करके
बो दिया जाता
एक प्रेम
जिसमें है कर्म की प्रधानता
जहाँ फल की इच्छा मार दी गई
फूलों का रंग
जिसमें सप्तरंगी नहीं
होता है श्वेत
जिसकी संभावनाओं को छला जाता
और उसे दिया जाता छोड़
असम्भावनाओं के दौर में
जिसमें परिव्याप्ति नहीं जगत की
होती है तो मात्र
उस प्रेम से कामना मुक्ति की ////
उसी दीवाने को खोजता
मैं करता रहा परिक्रमा
वो मिला या नहीं
ये मुझे आज तक नहीं पता
पर सदियों से मुझे
मिलती रहीं गोपियाँ
जिनकी उम्र तरसती रही
त्रेता से कलयुग तक
मात्र एक वैध्यता के लिए,
अब तक तो अजर हो गई है
बिना किसी अमृत के
शायद नीलकंठ का आशीर्वाद है
वरना मरने के बाद
उनको सिंगार नहीं भाल मिला
और मिला जूट का थैला
जिसमें दफ़न करके
बो दिया जाता
एक प्रेम
जिसमें है कर्म की प्रधानता
जहाँ फल की इच्छा मार दी गई
फूलों का रंग
जिसमें सप्तरंगी नहीं
होता है श्वेत
जिसकी संभावनाओं को छला जाता
और उसे दिया जाता छोड़
असम्भावनाओं के दौर में
जिसमें परिव्याप्ति नहीं जगत की
होती है तो मात्र
उस प्रेम से कामना मुक्ति की ////
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