रविवार, 19 जुलाई 2015

कविता शीर्षक :- एकांत

एकांत 
कितना सुन्दर होता है
खुद के पास होने के लिए 
या ज़ेहन में बसी दुनिया के
कभी सोचता हूँ कि ऐसा क्यों होता
कि मैं संतुष्ट नहीं रहता
अपनी किसी भी परिस्थिति में
कभी कुछ न करने
कभी बहुत कुछ कर लेने के बाद
इस असंतोष को पालता हूँ
कभी घनघोर ऊँचाइयों के सामने
खुद को पाता हूँ चींटी सा
तो बन जाना चाहता हूँ अगले ही पल
विश्व-विराट।
एकांत
कितना भयावह होता है
निर्वासन की उन्मुक्त सहमति
जीवन के भोग की अगली अवस्था
अंत में खोह की पातालीय कंदराओं
से आती प्रतिध्वनियाँ........
जिसके भ्रम में
लगातार धँसता जाता हैं एकांत
जिसमें अचेतन क्रियाशील है
चेतन को नश्वर बना देने के लिए
जिससे वह पी सके
समुद्रमंथन का देवद्रव्य।
एकांत
अपरिभाषित आदिम शब्द है ।

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