रविवार, 19 जुलाई 2015

कविता शीर्षक :- भाषा

लगातार अपनी भाषा से गुज़रना
इंसान का खुद से गुज़रना है
उसकी सभ्यता का मतलब है 
उसके कंठ से निकली ध्वनियों के
मूर्त रूप का इतिहास, जहाँ
इंसान मात्र फेफड़े के
फूलने-पचकने नहीं अपितु
इंसान होने से है, जिसमें
चिन्हों का शास्त्र बुद्ध होना नहीं
बल्कि होना है सारनाथ /
भाषा का लूटा जाना
इंसान को लूटा जाना है
क्योंकि यह धरती पर
आखिरी बचे हुए इंसान की शर्त है /
जहाँ आस-पास जीव तो होगें
इंसान संभव दुर्लभ /
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भाषा में कबीर होना या तुलसी
यह इंसान होने जैसा है
भाषा में कालिदास होना या शेक्सपीयर
यह इंसानी होने जैसा है /

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