रविवार, 19 जुलाई 2015

कविता शीर्षक :- हाफ विडो

रात की दो आँखें 
टुकुर-टुकुर नुक्कड़ तक 
नज़रें जमाये हैं
एक-एक करके बंद हो गए
तमाम दरवाजे
जहाँ से वे पा रही थीं
थोड़ी रोशनाई
बढ़ रही थी बेचैनी
और गिरते ताप के साथ
रह-रह कर फड़फड़ा रही थी शिराएं
अंदर से आ रही थीं अनसुनी आवाज़े
जैसे छिनाझपटी में हाथ-पाँव
फिसल रहे हो या घिसड रहे
जैसे-जैसे बाहर फ़ैल रहा था सन्नाटा
दबे पाँव कहीं गहरे भीतर
हज़ारों कदमताल करते जूते
रौंद रहे थे उसकी सुबह
और एक हुजूम में
सुनाई पड़ रही थीं सिसकियाँ,
क्योंकि आज रात भी नहीं लौटा
हैदर/

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