१-; शोख हवाओं के परिंदों से
कुछ कहना हम भूल गए
वादी के इस नए मौसम से
हम उड़ना भी आज भूल गए ///
कुछ कहना हम भूल गए
वादी के इस नए मौसम से
हम उड़ना भी आज भूल गए ///
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२-; अक्स तेरा आज भी जिंदा है कहीं
फिर भी नामो- निशा तेरा दिखता नहीं कहीं
२-; अक्स तेरा आज भी जिंदा है कहीं
फिर भी नामो- निशा तेरा दिखता नहीं कहीं
रोज़-रोज़ चलता हूँ तेरे रूखे साथ में
फिर भी तेरी पैमाइश होती नहीं कहीं ..////
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३-; लोग फिर से मुकम्मल जहाँ ढूंढ़ते है
परिंदे फिर से नए मौसम का आशियाना ढूंढ़ते है
पर क्यूँ हम ज़िन्दगी के नए रास्तों पर
फिर वही पुराना करवा ढूंढ़ते है ..///
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४-; हम जिस्म के दागों की दावा करते रहे
फिर भी नए दाग लगते रहे
ज़िन्दगी इसी कशमोकश में रही
मौत से भी इसकी दावा न बनी
लोग फिर कब्र पर भी आते रहे
अब तो मिट्टी, मिट्टी से लड़ने लगी
दरख्तों पर भी आज दाग लगने लगे
ज़िन्दगी गुज़र हरने में थी लगी
कब्र की तहों से भी हारने लगे ////
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३-; लोग फिर से मुकम्मल जहाँ ढूंढ़ते है
परिंदे फिर से नए मौसम का आशियाना ढूंढ़ते है
पर क्यूँ हम ज़िन्दगी के नए रास्तों पर
फिर वही पुराना करवा ढूंढ़ते है ..///
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४-; हम जिस्म के दागों की दावा करते रहे
फिर भी नए दाग लगते रहे
ज़िन्दगी इसी कशमोकश में रही
मौत से भी इसकी दावा न बनी
लोग फिर कब्र पर भी आते रहे
अब तो मिट्टी, मिट्टी से लड़ने लगी
दरख्तों पर भी आज दाग लगने लगे
ज़िन्दगी गुज़र हरने में थी लगी
कब्र की तहों से भी हारने लगे ////
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