रविवार, 19 जुलाई 2015



यात्रा के अंतिम पड़ाव पर
लिखा अंतिम शब्द
किन्हीं पहचाने से रास्तों पर
वापसी का पहला इशारा होता है।
बढ़ते हुए कदम 
अप्रत्याशित लालसा से परिपूर्ण इच्छाएं
होती हैं नेति।
क्योंकि इसके पूर्व सद्
निर्धारित रूप में संघर्ष है करता
पा लेने के लिए वे तमाम
अज्ञात सहजीवी ज्ञान
जिसमें वह बच सके
मात्र वस्तु होने से ,
जिसके वृत्त में वो
दौड़ता है लगातार
केंद्र की ओर , जैसे
किसी कटी पतंग के पीछे
दौडते है दो पाँव
जबकि कई दुर्दिन हाथों से
दी जाती है फाड़ ,
और आखिर में बच जाते हैं तो
दो हाथ और दो पाँव।

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