शुक्रवार, 18 मई 2012

मैं और तुम



सपहा सपहा जीवन से मिट
जाती है संवेदनाये, क्यों
क्यों धरातल इतना कठोर
हो जाता कि ,अगर
गिर जाये कोई तो
टूट जाता है, या
कह सकते है बिखर जाता है
संवेदनाये इतनी कमज़ोर तो
नहीं होती ...परन्तु
समय सम्बद्ध परिभाषाये
और स्वरुप बदल जातें है
जैसे मै और तुम बदल गए /

ईशा और मैं



ईशा को भी मिला था
सलीब पे कुर्बा होने का
सिला .....
मैंने भी होना चाहा कुर्बा
पर न अब वो सलीब ही रहा
और न वो खुदा ...
ऐसा नहीं कि मैं कभी
खुदा होना चाहा
पर होना चाहा उन लोगो का
जिनका खुदा होता है ...
पर न वो लोग मिले
और न मैं कुर्बा हुआ ...
धत तेरी कि .....

मोहभंग


अब नहीं मैं लौट पाऊंगा कभी
क्योकि तेरी याद में
अब प्यार सा लगता नहीं
लगता है वह केवल
सपनो का खँडहर और
उनकी कुछ टूटती दीवार जर्जर
जिस पर कभी रौशनी
और अलसाई हुई कुछ दूब होती थी ///

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए मिलकर बैठे
साथ तेरे 
बहुत दिन हुए पकड़कर बैठे 
हाथ तेरे 
बहुत दिन हुए सुलझाये तेरे उलझे 
बाल तेरे 
बहुत दिन हुए आँखों में 
डूबे तेरे 
बहुत दिन हुए देखे दिन में 
ख्वाब तेरे 
बहुत दिन ......मगर तुम कहती हो
कि अभी कल की ही तो बात है ..
पर बहुत दिन हुए//////// 

बानगी

गिर गए है शाख से पत्ते बहुत
ज़िन्दगी के ......
शायद आज फिर से तूफ़ान आया है
कही पे ........
बच गए है कुछ निशां अब
ज़िन्दगी के .....
शायद बानगी है नए पत्तो की
यहाँ पे ...

रकबा


हर रकबा था मेरा न जो 
चाह बहुत बनाना अपना 
धीरे-धीरे बना चौहद्दी 
और बनाई मेड़े भी  
सींच-सींच कर, बो कर
ख्वाबो के कुछ बीज भूरे-भूरे

रातों की नीदों को उसके आँचल  
में रखकर ,
खुली हवाओ की थपकियों से 

किया जिसे था हरा-भरा 
जैसे माँ अपने बच्चो को
पला करती 
अपने ख्वाबो की डाली पे बैठा कर
और वही डाली एक दिन जैसे
तेज़ हवाओ में तोड़ 
सारे ख्वाबो को
खुद ही पला करता है 

कुछ रकबो का ख्वाब    

मेरा रकबा वैसे ही
जो न था मेरा
ले जाता है आसामी 
मंडी और बाजारों में, और
मोला-तोला है भावो में
चाहा बहुत जिसे बनाना अपना
धीरे-धीरे बना चौहद्दी
हर रकबा था मेरा जो न //////


विकल्प

उन नाखुनो की खुरचन से 
बचना चाहा है मैंने
जिनके पंजो में
आ जकड़ा, शायद
यह विकल्प ज्यादा 
अच्छा था , क्योकि
जकड़ा जाना कम
दुष्कर है, वानस्पत
खुरचे जाने के ///////