शुक्रवार, 2 मई 2014

कोठरी

अब भी जाता हूँ अधकच्चे रास्तों से 
उस अँधेरी सीलन भरी कोठरी में 
जो मेरे पुश्तैनी कोठी के ठीक दांये थी 
जिसे अब मेरे चाचा-बाबा ने छोड़ दिया 
कह कर ये , कि अब इसकी दीवारें चरचरा गयीं हैं
और छत भी लचक गई है
अब उसके आँगन के बीच तुलसी 
बस ठूंठ भर रह गई है 
और किनारे का बम्बा वैसे ही खड़ा
बिना हत्थे के जंग लगा
जिसके नीचे पुरखों के मर्तबान
रखने से एक अर्ध चन्द्र बन गया है ,
और लकड़ी के दरवाजे जिनके नीचे का सिरा
झड़ गया है , लटके हैं उन्ही कुंडो के सहारे
जिन्हें मैं बचपन में अपनी ऐड़ी उचकाकर भी
नहीं पता था खोल ,
जिनसे होकर मैं अपनी दुपहर में
छत्ती पर रखी सन्दूकचियों को
खंगालता, और उन तमाम पन्नों को
जिनमें दफ़न थे पुरखों के किस्से
जिनमें से कुछ मैंने सुन रखे थे
पहले भी माँ से ,
उसी सीलन भरी कोठरी में
दिवार में गड़ी लकड़ी की खूटी
जिस पर लटका रहता एक लम्बा कुर्ता
साथ ही एक सुफेद अनौछा
और उसमें पड़ी मसहरी
जिसके सिरहाने पर पड़ी थीं
दो पैरों के बीच खेलती यादें
जिसमें कोई एक बारगी ऊपर उठाता
फिर नीचे.........
दरअसल अब तक पड़ी थी कुंडली
जिसे अबकी कर दिया गया प्रवाहित
कारण मात्र इतना दिया कि
लोगों के मर जाने के बाद
उनकी चीज़ों को रखना अशुभ होता है /

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