शुक्रवार, 2 मई 2014

यात्रा

रोज़ की हड़बड़ी में 
तैयार होता हूँ पहुँचने के लिए वहाँ, 
जहाँ पर रास्ते हो जाते हैं खत्म 
क्योंकि मैं लौटना चाहता हूँ 
बिना किसी हड़बड़ी के 
आहिस्ते-आहिस्ते.......,

मेरे साथ चलने वाले 
होते है, बहुत से अनजान चेहरे
जिनकी गर्दन से जुड़े हाथ
थामे रहते है स्टैंडिंग होल्डर
जिससे उनको भरोसा होता है कि
वो पहुँच जायेंगे, जहाँ वो चाहते है।
मगर उस क्रम में उनकी आँखें
होती है चौक्कनी कि कब
बगल वाले को प्रतिस्थापित कर
हो जाये खुद काबिज़
जैसे उस होल्डर हो हासिल करना
हो स्वयं जीजिविषा का प्रश्न /

मेरे साथ होता है पूरा आज
जिसमें कोई अपनी सीट
दे रहा होता किसी जरूरतमंद को
तो कोई खुद को संतुष्ट कर लेता है
दो के बीच आड़ा-तिरछा घुसेड़ कर ,
उनमें से कुछ तो खड़े होकर
इन्द्रियों का आभासी सुख लूटते हैं ,
किसिम-किसिम का लोक-संसार
होता है मेरे आस-पास ,
जिसमें रास्तों की बातें नहीं होती
और न कोई चाहता है लौटना
बल्कि होती हैं मात्र मंजिलें ही मंजिलें,
क्योंकि रास्ते कभी खत्म नहीं होते शायद
और न हड़बड़ी। ....

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