शुक्रवार, 2 मई 2014

आदिम इच्छा

सन्नाटों से गुजरती हवाओं से 
कभी तुमने बातें की हैं ?
बहती नदियों के किनारे बैठकर 
कभी तुमने सुनी है उनकी दास्तां?
चमकते तारों में खोये चाँद से 
कभी तुमने पूछा है उसका ठिकाना ?
या बेख्याली में चलते हुए 
कभी तुमने ज़िन्दगी को किया है महसूस?
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कभी वक़्त मिले तो लिखना मुझे
उन हवाओं की बातें
उन नदियों की दास्तां
उस चाँद का ठिकाना
और हाँ, देखो!
उस ज़िन्दगी को न भूल जाना
क्योंकि थोड़ी बेख्याल है ये ////

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