शुक्रवार, 2 मई 2014

पानी

पानी हूँ 
बदलते मौसम में 
हूँ बदलता रहता 
मगर अपनी नियति में 
भरता नहीं कोई रंग //
तुम धूप बन जाओ 
या सर्द हवाओं के थपेड़े
या मेरे ताप को बना लो
अपने रगों में बहता दरिया
मगर अपनी आखिर में
छोड़ रखता हूँ
तुम्हारे साथ गुजरे हर वक़्त
और कोशिश में एक नमी
जिसमें मैं,
तुम्हें कर सकूँ महसूस
और दे सकूं खुद को
तुम्हारा रंग
तुम्हारा आकार
तुम्हारी बातों को उनके अर्थ /

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