शुक्रवार, 2 मई 2014

दुविधा

कई बार खोजता हूँ 
यहाँ-वहाँ तमाम अनजान चेहरों में, 
दो अनजान लोगों की ख़ुशी को देख, 
मैं भी मुस्कुरा लेता हूँ हौले से कभी, 
सन्नाटों की तहों में दबी कई रातों में 
जब आँखों की दोनों भौंए सिकुड़ी रहती हैं 
फिर-फिर घंटों तलाशने के बाद भी 
यह तय नहीं हो पता कि मैं किस 
अमूर्त को मूर्त बनाने की कोशिश कर रहा हूँ
या बिलकुल इसके उलट,
तब अक्सर ये सवाल खुद ही खड़ा होता है कि
उसे उसके रंग से पहचानूं
या उसकी गंध से ?

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