मैं शिखर से कविता नहीं लिखना चाहता हूँ
मैं खुद से गुजरना चाहता हूँ
जहाँ से तुम हर रोज़ गुजरते हो
जहाँ पर तुम्हारी रोटी का दाम लगाया जाता है
और तुम्हारे ख्वाबों को संसद मे उछला जाता है
अब मैं छंदों मे सौंदर्य नहीं रचना चाहता
क्योंकि सौंदर्य के नाम पर तुमसे
रोज़ उगाहा जाता है तुम्हारे भावों का संसार
जहाँ तुम्हारी स्त्रियों की सुरक्षा को
दूसरी स्त्रियां ही रंगभेद के लिहाफ में
टांगती हैं पूंजी के वैश्यालय में ,
जहाँ होता है बलात्कार पुश्त-दर-पुश्त
बिल्कुल वैसे ही जैसे दिन के उजाले में
हर सफ़ेद लिबास रात की स्याह से होकर गुजरता है
जहाँ तुमने जब भी मांगी थोड़ी आजादी
तो तुमको विद्रोही समझा गया इस लोकतंत्र में
अब मैं शब्दों को उनके समझे गये अर्थों मे नहीं लिखना चाहता
बल्कि उसमें जिसमें तुम्हारे होने का असल मतलब समझ आये
कि स्मृतियों को मिटाने से अर्थ बदल जाते हैं
मैंने चिन्हों के उन शास्त्रीय मुहावरों को
जब भी चाहा लिखना,
तुम्हारी उदर की भूख विष्ठा से चुने गये दानों से
मिटती नज़र आई
दरअसल भूख और प्यास के सहारे ही ज़िंदा
रहा है तुम्हारा इतिहास
जिसकी न कोई तारीख ज़रूरी थी और न तस्दीक
कविता में जब भी भावों का संसार रचना चाहा
तब तुम्हारी संततियों की उसी स्थिति से खाता हूँ भय
जिसको तुमने कुएं की घिरनी पर स्थापित कर दिया है
क्योंकि कविता में पुनरावृत्ति से बिगड़ जाता हैं उसका कवितापन
जैसे रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान ////
मैं खुद से गुजरना चाहता हूँ
जहाँ से तुम हर रोज़ गुजरते हो
जहाँ पर तुम्हारी रोटी का दाम लगाया जाता है
और तुम्हारे ख्वाबों को संसद मे उछला जाता है
अब मैं छंदों मे सौंदर्य नहीं रचना चाहता
क्योंकि सौंदर्य के नाम पर तुमसे
रोज़ उगाहा जाता है तुम्हारे भावों का संसार
जहाँ तुम्हारी स्त्रियों की सुरक्षा को
दूसरी स्त्रियां ही रंगभेद के लिहाफ में
टांगती हैं पूंजी के वैश्यालय में ,
जहाँ होता है बलात्कार पुश्त-दर-पुश्त
बिल्कुल वैसे ही जैसे दिन के उजाले में
हर सफ़ेद लिबास रात की स्याह से होकर गुजरता है
जहाँ तुमने जब भी मांगी थोड़ी आजादी
तो तुमको विद्रोही समझा गया इस लोकतंत्र में
अब मैं शब्दों को उनके समझे गये अर्थों मे नहीं लिखना चाहता
बल्कि उसमें जिसमें तुम्हारे होने का असल मतलब समझ आये
कि स्मृतियों को मिटाने से अर्थ बदल जाते हैं
मैंने चिन्हों के उन शास्त्रीय मुहावरों को
जब भी चाहा लिखना,
तुम्हारी उदर की भूख विष्ठा से चुने गये दानों से
मिटती नज़र आई
दरअसल भूख और प्यास के सहारे ही ज़िंदा
रहा है तुम्हारा इतिहास
जिसकी न कोई तारीख ज़रूरी थी और न तस्दीक
कविता में जब भी भावों का संसार रचना चाहा
तब तुम्हारी संततियों की उसी स्थिति से खाता हूँ भय
जिसको तुमने कुएं की घिरनी पर स्थापित कर दिया है
क्योंकि कविता में पुनरावृत्ति से बिगड़ जाता हैं उसका कवितापन
जैसे रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान ////
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