सुबह जब मैं उठता हूँ
तो बगल में लग चुके होते हैं
ताज़े फूलों के गुलदस्ते
और तुम रसोई में तुलसी-पानी उबाल रही होती हो,
मेरे कदम ज़मी पर रखने से पहले
वो दूर से ही चमक रहा होता है
ये रोज़ होता है
जैसे आज फिर से मेरे टूथब्रश में पेस्ट
लगा रखा है पहले से ,
तुम्हें पता होता है कि
मुझे कौन-सी शर्ट पहनने का मन है
हाँ! ये भी कि कल जूते कहाँ उतरे थे,
कितना कुछ करती हो तुम
न जाने कैसे ,,,,,,
जानती हो कभी-कभी
सोचता हूँ कि हमेशा तुम
मेरी पसंद का ही खाना बनती हो
क्या तुम्हारी पसंद नहीं है कोई ?
यहाँ तक कि जाते-जाते तुम
कभी मुझको मेरा टिफ़िन तो कभी मेरा बैग
भाग-दौड़ के थमाती रहती हो,
फिर सोचता हूँ कि
बिना सैलरी के तुम क्यों करती हो ये सब ?
और जब बाहर के तमाम झंझटों से लौटता हूँ
तुम पर अपनी झल्लाहट निकलता हूँ
फिर भी तुम यूँ ही उतने ही भाव से
मुझे पानी-चाय देती रहती हो
और जब मैं शांत होता हूँ तब
पास आकर मुस्कुरा कर कहती हो
आज खीर बनाई है। …।
अक्सर सोचता हूँ कि
क्यों करती हो इतना
और उससे भी बड़ा सवाल कि
कैसे करती हो सब ?
संडे को जब बाजार के लिए
तैयार होती हो तो मुझसे
पूछती हो हमेशा कि
कैसी लग रही हूँ ,
मेरी हाँ-ना से तुम खुद को
सौंदर्य के प्रतिमान में रखती हो
और कुछ भी खरीदने से पहले
अपनी सहमी आँखों से मेरी
आँखों में देखना और ढूँढना उत्तर ,
अक्सर मैंने देखा है कि
रास्ते पर तुमने कभी आगे कदम नहीं रखे,
और अपने शीर्ष बिंदु पर मेरे नाम की
सिंदूरी रेख आजीवन रखी, जबकि
मैंने तो कभी नहीं किया ऐसा कुछ। ....
कैसे करती रहती हो ….....?
मैं आज भी निरुत्तर हूँ.......।
तो बगल में लग चुके होते हैं
ताज़े फूलों के गुलदस्ते
और तुम रसोई में तुलसी-पानी उबाल रही होती हो,
मेरे कदम ज़मी पर रखने से पहले
वो दूर से ही चमक रहा होता है
ये रोज़ होता है
जैसे आज फिर से मेरे टूथब्रश में पेस्ट
लगा रखा है पहले से ,
तुम्हें पता होता है कि
मुझे कौन-सी शर्ट पहनने का मन है
हाँ! ये भी कि कल जूते कहाँ उतरे थे,
कितना कुछ करती हो तुम
न जाने कैसे ,,,,,,
जानती हो कभी-कभी
सोचता हूँ कि हमेशा तुम
मेरी पसंद का ही खाना बनती हो
क्या तुम्हारी पसंद नहीं है कोई ?
यहाँ तक कि जाते-जाते तुम
कभी मुझको मेरा टिफ़िन तो कभी मेरा बैग
भाग-दौड़ के थमाती रहती हो,
फिर सोचता हूँ कि
बिना सैलरी के तुम क्यों करती हो ये सब ?
और जब बाहर के तमाम झंझटों से लौटता हूँ
तुम पर अपनी झल्लाहट निकलता हूँ
फिर भी तुम यूँ ही उतने ही भाव से
मुझे पानी-चाय देती रहती हो
और जब मैं शांत होता हूँ तब
पास आकर मुस्कुरा कर कहती हो
आज खीर बनाई है। …।
अक्सर सोचता हूँ कि
क्यों करती हो इतना
और उससे भी बड़ा सवाल कि
कैसे करती हो सब ?
संडे को जब बाजार के लिए
तैयार होती हो तो मुझसे
पूछती हो हमेशा कि
कैसी लग रही हूँ ,
मेरी हाँ-ना से तुम खुद को
सौंदर्य के प्रतिमान में रखती हो
और कुछ भी खरीदने से पहले
अपनी सहमी आँखों से मेरी
आँखों में देखना और ढूँढना उत्तर ,
अक्सर मैंने देखा है कि
रास्ते पर तुमने कभी आगे कदम नहीं रखे,
और अपने शीर्ष बिंदु पर मेरे नाम की
सिंदूरी रेख आजीवन रखी, जबकि
मैंने तो कभी नहीं किया ऐसा कुछ। ....
कैसे करती रहती हो ….....?
मैं आज भी निरुत्तर हूँ.......।
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