सोमवार, 13 जनवरी 2014

समय-पाठ व प्रेम

चारो तरफ के नगाड़ों के शोर में 
वो कहते हैं कि 
अपनी आदत बदलो 
क्योंकि सियासत बदल गई है, 
बदलते सन्दर्भों में बदल डालो 
शब्दों के अर्थ 
गढ़ के नए शब्द 
जिससे कविता का अर्थ वही हो 
जो इस शोर में सुनाई न पड़े 
तुम मात्र शोर के सर्जक हो 
किसी भाव या विचार के बिंदु नहीं 
चारो तरफ के जलते ताप में 
वो कहते है कि 
अपने मुखौटे बदलो 
क्योंकि पहचान के मानदंड 
बदल गए हैं
भीतरघाघ समय में 
नयी परिभाषा गढ़ो  
जिससे सम्बन्धों से नहीं 
आँखों के कोटरों से  
नाक-कान की बनावट से 
ओठों की मोटाई 
यहाँ तक कि रंग से फर्क हो सके 
तुम मात्र मनुष्य नहीं हो 
तुम अगली पीढ़ी के वर्गीकृत जीव हो 
तुम मुखौटे हो 

इस शोर और ताप के मध्य 

मैं कहता हूँ कि 
ऐसे शब्द गढ़ो जिनका अर्थ हो 
प्रेम....
ऐसे मुखौटे बदलो 
जिससे सब तो नहीं गर 
कुछ तो कर सकें तुमसे 
प्रेम....
हाँ मैं न सर्जक हूँ 
और न कविता होती है 
इन सबके बीच यदि 
कोई भाव या विचार बिंदु है तो वो है 
प्रेम ....  
क्योंकि बदलते समय में 
बृहत्तर मनुष्यत्व का उर्वर विस्तार है 
प्रेम .../ 

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