रविवार, 1 दिसंबर 2013

झाड़ न दो

रेत को मुट्ठी में पकड़ के देखा
तो भुरभुरा के खिसक जाती है
रह जाते है तो कुछ कण
जो चिपके रहते है अंतस में
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उन्हें झाड़ न दो ,

मिट्टी को हवा में उड़ते देखा
तो रौशनी के साथ ओझल हो जाती है
रह जाती है तो एक परत
जो बैठी रहती है रोशनदान की जालियों पर
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उन्हें झाड़ न दो,

बारिश की बूंदों को गिरते देखा
तो आंगन में फ़ैल जाती हैं
अपनी पूरी निर्मलता की शिद्दत से
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उन्हें झाड़ न दो,

इंसान को जब पनपते देखा
तो फैला देता हैं हर सम्भावित दिशाओं में
सूक्ष्म बुनावट वाला जाल
जिसमे नज़र आती हैं उसकी पहचान
किसी जालीनुमा मछली के गलफड़ों सी
जिससे वो कहला सके खुद को मोती मछली
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उसे झाड़ न दो
और निकाल न लो उसके गलफड़े में फंसा
वो मोती ,
जिससे वो सिद्ध करना चाहता है
कि वो सीपी हैं /


   

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

दीमक

इस अंधियारे में चुप्पी से
चाट रहे है कई दीमक
मेरे स्वप्न-घर के किवाड़ 
और तुम खड़े हो सामने मेरे
खोखल में पड़े लिजलिजे
दसियों दांतो वाले मासूम कीड़े से
जो निरंतर मद्धम मेहनतकश है
मेरी आँखों की चमक को
धुंधला करने के लिए,
जिससे मेरा लाख का महल
पाये न जलने अपितु
गिर जाये भुरभुराकर और
हज़ारों छिद्रों से घुंस सके
सिहरती सर्द हवाएं
जमा देने के लिए लाल ग्लेशियर
कभी देखा है उसे
जो चीरता रहता है निपट एकांत को भी
इस अंधियारे में
प्रकट होते है बहुत से चेहरे, दृश्य-चित्र
मेमने के पीछे भागता भेड़िया
भेड़िये के पीछे भागता नरभक्षी
नरभक्षी के पीछे भागता नर
नर के पीछे भागता नर
और अंत में एक अदृश्य तट
जिसपर कुछ निरंतर भ्रम है बना 
मानो कहीं भीतर ही भीतर
मिल रही हो चेतावनी
किर्र- किर्र- किर्र -किर्र.......////

सोमवार, 18 नवंबर 2013

रेखाएं बदलती हैं

रेखाएं बदलती हैं
मुझे नहीं लगता
वरना खादी पहनने वाले
किसी फ़िल्म के अभिनेता न बन जाते ?
खैर नेता न बन पाने से
कोई जनता भी नहीं बन जाता
बस कल ही कचहरी वाला तोता
निकाल बैठा
मेरा बेटा ज़मींदार होगा
मैंने कहा ज़मींदारी कैसे मिलेगी ?
तो फटाक से निकाल दी खानदानी पर्ची
जिसमे लिखा था गड़े खजाने का रहस्य
सतपुड़ा के जंगल !!
अरे! मेरा बेटा जंगली होगा ?
रेखाएं कैसे बदलती है !
छुटपन में हस्तशास्त्र  में पढ़ा था
शनि राहु पाहुन बन के आयेंगे
और स्त्रियों को शगुन में ले जायेंगे 
तब ही मैं सोचता हूँ कि अब चाँद
दिखता क्यों नहीं या बड़े शहरों में
चार इंच की दिवार बहुत ऊँची हो गई है ,
अब बचा ही क्या जो मैं जानता
कि रेखाएं बदलती है
क्योंकि रुपया हाँथ का मैल होता है
हद्द हो गई अब कहाँ है कोई शुद्ध 
सब तो ज्यादा से ज्यादा 
उठाना चाहते है मैला, कामना चाहते है
बचाना चाहते है, उड़ाना चाहते है
आज कल तो गुप्तचरों ने रात के अँधेरे में
कईयों को सोते देखा है मैले पर
अरे अब तो सोना भी मुहाल है
पता नहीं कब मैले वाले की
बड़की चारपहिया कचक जाये
और हमें भेज दे ब्लैकबक योनि में
पता नहीं धोती वाले ने क्या सोचा था
कि घर को मैला मुक्त बनाएंगे !
रेखाएं बदलती है
मुझे नहीं पता
कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार
और सुबह होने न दे
ढाई आखर का प्रेम डेढ़ ही रहने दो
क्योंकि ज़िन्दगी के साथ का तो क्या 
बाद में सेकंड इनिंग होम का ही सहारा है
अरे सहारा से भी रेखाएं बदलती हैं
साईकिल चलाते-चलाते देखो जहाज़ चलाने लग जाता है
वैसे अब रेखाएं बदलती है
मुझे नहीं पता
वरना दो अर्थों के भय से मुझे क्या
मुझे तो द्विअर्थी में ही मज़ा आता है
कहीं सुना था कि
जो मज़ा खाज में है वो मज़ा राग में कहाँ  ///

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

ख़त

बहुत दिनों से 
तलाश रहा था वो ख़त , 
जो तुमने लिखा था 
जिसमे तुमने बताई थी 
बहुत सी बातें 
कि कब तुमने खरीदी थी 
मोगरे वाली धूप 
कब तुमने की थी 
चाँद से शिकायत 
कब तुमने काट ली थी 
उंगलियाँ बेख्याली में , 
और कब तुमने शकुंतला पढ़ते हुए 
भिगो दिया था सिरहाने को
और हाँ ...वो भी जिसमे 
तुमने मुंह फुला के लिखा था 
कि तुम कुछ नहीं लिखते .../

खोजते-खोजते 
उस धूप की महक
उस गप्पी चाँद
और वो बेरहम धार 
जो साल रहा था अन्दर-अंदर
स्मृतियों को कहीं हल्के से निर्मम
सबसे मिल आया, पर
अभी बाकी है एक जगह 
वही सिरहाना, जहाँ तुमने 
बचा के छोड़ रखी है
ज़िन्दगी की नमी ..../////   वित्रि

                         
  
  

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

नौ बच्चों वाली

हजारों कदमों के बीच
उड़ती धूल और गन्दगी के बीच
लपलपाती है लाखों मक्खियों की ऒर
जैसे मानो उनसे कर रही हो
छिना-झपटी या मनमनुहार
कि मैं भी हूँ ईश्वर की निर्मिति
या समझो तो डार्विन के विकास की नियति
इस बीच वो ताड़ के दो बार
आ चुकी है गली के कोने में पड़ी
कार के नीचे,
जहाँ नौ जोड़ी आँखें
टकटकी लगाये सकपकाई सी
आते जाते कदमों की ताल और
टायरों की रगड़ के बीच कर रही होती
इंतज़ार .......
तभी चौधरी दूध की थैली
लेकर निकलता है रोज़ की तरह
काले रंग की खोज में और
रह जाती है फिर से वो
अभागी या शास्त्रों के भाग से अछूती
थक हार कर अपने खून का ही रंग
कर देती सफ़ेद जिससे
वो निभा सके अपना धर्म
साथ ही पा ले तमाम धर्मों से मुक्ति और
अपने नौ नवजात बच्चों की आँखों की चमक
और अपनी एक आँख में संतोष तो
दूसरी आँख में अगली लड़ाई की चित्रावली ../////   वित्रि

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

लौटा हूँ इन्हीं हालातों में

कठिन क्षणों में
जीवन का उद्भास
ये प्रश्न खड़ा करता है
मुँह बाए .....
कि शेर और भेड़िये
देखतें है कैसे एक दूसरे को ?
और उनकी आँखों में लहू
होता है या मौके की तलाश ?
कि कब दूसरा पिछड़े और
उतार दे अपने नुकीले दांत
सामने वाले की गर्दन में गहरे /
मेरे चारो तरफ नुकीले दांतों की
बड़ी-बड़ी संरचनाएं लहू और मौके की
छिना झपटी में खड़ी चमक रही है /
जिनमे मेमने की तरह जान
अपनी जान बचा लेने की जुगत में
लगा रहता है हर इंसान
अपनी तरह की इस बन्दर बाँट में //

बुधवार, 28 अगस्त 2013

अ- चेतन

बहुत कुछ है दरम्याँ
उजालों में ख्वाब
अंधेरों में खुली आँखें
और रास्तों पर चलते
बेख्याल कदम ..,
कुछ ऐसी ख़ामोशी
जिन्हें जुबा देना
हो जाता है मुश्किल ...
ख्वाहिशों की न खत्म होने वाली
फेरहिस्त ...
जो रोज़ बढ़ती जाती है
जैसे रौशनी की
बदलती दूरी में
परछाई ..///

तीनों के बीच

मैं, मोह, और मृत्यु
तीनों के बीच
जीता हूँ......

आत्म, जग, पर
तीनों के बीच
मलता हूँ आँखें...

युद्ध, शांति, और संशय
तीनों के बीच
पाता हूँ खुद को ...

निवास, निर्वासन और निर्वाण
तीनों के बीच
खोजता हूँ पहचान

रोटी, कपड़ा और मकान
तीनों के बीच
कोशिश हूँ करता
उन तमाम तीनों का
मतलब समझने का....
जहाँ तीन मकारों के परे भी
दुनिया पल रही है
बढ रही है /////

सोमवार, 15 जुलाई 2013

भुक्का

मुझे बेतकल्लुफी से कहना न आया
जब भी कहा तो शब्दों का खिलवाड़
मात्रों का अगला पिछला करके
बना देता हूँ तेरे को मेरा और
बाइबिल से कुरआन से पुराण
बर्फ को मानचित्र पर लाल रंग
हूँ दे देता, साथ में तीसरी दुनिया को जेनोसाइड
अपराधी बनाकर हेग में कर देता हूँ खड़ा ,

अक्षरों में कुलबुलाहट होती है
मोनोलिसा की मुस्कराहट में
सतह के ऊपर बिलबिलाते रिगियाते
महाद्वीपीय मध्य का अबोध रोदन
जिसमे जीवन की श्रेष्टता की वंचना
दोनों कोरों पर आज तक जमी है ,

कहने में जब भी आया बस कहा
विमर्शों के पर्यावसान के बाज़ार में
जब भी खड़ा होता हूँ तो छूंछे हाँथ
जिससे लौटूं तो मेरे हाँथ खोखले
आदर्शों से भरे हो और मेरी आखों पर
यथार्थ का रंगीन चश्मा टंगा रहे
जिससे मैं अगली बार तुमसे मिलूं
तो तुम्हारे खोखले आदर्शों से आँखे मिला सकूँ
और तुम्हारे यथार्थ रंगीन हांथों को चूम सकूँ ///
(जिससे तुम सबको अपना
बनाने का भ्रम पाल सकूँ _) ... वित्रि

गौरैया

आज बहुत दिनों बाद देखी
मुंडेर पर बैठी गौरैया
शायाद एक अरसे बाद
बेगाने कसबे में तो बस पढ़ा था
उजड़ने के बाद मुश्किल होता है बसना
वहीँ सुना था कि उसको निर्वासित
घोषित कर दिया गया है ....
जिसकी आत्मा में स्वार्थ निहित होकर
सुन्दर की निर्मम हत्या करके उसे
कल्पना के रूप में रोज़ परोसा जाता
हाय! उस सुन्दर छलना के दर्शन फिर हुए /

बेखबर

मेरी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे सुबह की ऒस बैठ जाती है 
पत्तों के कोरों पर,

उसकी चाहतें बिलकुल वैसी है 
जैसे हवा में उड़ता परिंदा 
जो उड़ जाना चाहता है उस पार,

हम दोनों की चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवाओं में तैरने के बाद ऒस
मिल जाती है असीम गहराइयों में
और परिंदा थक जाने के बाद
आ जाता है ज़मी पर
सुकून की चादर ओढने की तैयारी में,

इसी मेरी-तुम्हारी-हम दोनों
के बीच होते हुए भी
इन चाहतों के दरम्या
मैं बन जाता हूँ तुम्हारा, और
तुम मेरी निपट अपनी.....///// 

पहेली

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ बात मुझे कह लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो

तुम यादों में रह जाते हो
जैसे हरी दूब के किनके
दांतों में फंस जाते है ...
रफ्ता-रफ्ता खिसक-खिसक के
वो थोड़ा सा जो सताते है,

गहन क्षणों में भी तुम
दबे पाँव चले आते हो
कहते हो कि अब जाते है
पर रात तलक तुम यूँ ही क्यों
ओंठों पर मेरे मुस्काते हो

तुम अपने से लगते हो
जैसे यादें हो जाती है
बढ़ते चलते इस रस्ते पे
तुम साथ मेरे चलो साथी

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ बात मुझे कह लेने दो...////

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

"चुप्पी"

तुम्हारी चुप्पी में मौन नहीं
बस सरसराहट है सर्पतों की
झाड़ियों की, रिसते हुए श्रोते की
जिसमे भावों का भंवर जाल है
और कयास लगाने के लिए
मेरे सागर का दरियाई घोड़ा///

मैं शब्दबद्ध चाहता हूँ करना
तुम्हारे दो ध्वनियों के बीच की चुप्पी
जहाँ पर तुम सांस लेते हो
ठहर जाते हो तंत्रिकाओं को जोर देने के लिए 

दौड़ाना चाहता हूँ तुम्हारी चुप्पी का इतिहास
जो स्थिर होकर पुंसवादियों को
देती है मौका तुम्हारी ध्वनियों को
चुप्पी के बीच हज़म करने को ////

मेरे आस-पास संसार है चुप्पियों का
और मौन निमंत्रण की बहुत सी पत्री
जिसमे तुम्हारे उर्वर-भावों पर
निर्मम खुरों और हल-बारी से
मनमानी क्षुधा के खेत बोने-काटने का
और फिर तुम्हारी नसों में
मिला के परम्पराओं का रसायन
तुम्हारी ध्वनियों को चुप्पी में
बदलने का स्वागाताकांक्षी आमंत्रण है///

तुम्हारी चुप्पी का मतलब मैं समझता हूँ
पर ये पितृऋण से दबे हुए
तुम्हे गूंगा बनाने का स्वांग रचते है
इसलिए तुम बन जाओ अटलांटिक कटक
और समझा दो इन्हें अपनी चुप्पी का विस्तार
जिससे मेरे सागर का दरियाई घोड़ा
तुम्हारे धरातल पर आकर देख सके
कि पाताल की असीम गहराइयों को
तुमने कब का नाप लिया है और
धरा के ऊपर तुमने विस्तार लिया है पा///

क्योंकि कहते है
हजारों चुप्पी से मिलकर भी इक आवाज़ बनती है/////

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

चीज़ें

कमरे में रखा फूलदान
रोज़ नए-नए फूल लगते
मेरे उठने से पहले वो
अपनी जगह पा चुके होते है
जैसे कहते हो, आज तुम
फिर से देर कर गए /

फैले विस्तृत आकाश में
प्रछन्न मेघ मालाएं
रात्रि में काली स्लेट पर
चांदनी का टुकड़ा
यह सब नियत आ ही जाते है/

दराज में पड़ी किताबें अपनी
जगह पा लेती है और
मेरी कलम में स्याही
मेरे लिखने के लिए हर रोज़/

सब कुछ वैसा ही है जैसे
होते थे तुम साए में/
पर, पिछली बारिश में सब
गया धुल कर बह .........

फूलदान में सूखे फूल
स्लेट पर आमावश
और किताबों के पन्ने अब
खुली खिड़की की खड़खड़ाने से
लगे है फटने, साथ ही
कलम में सूखी स्याही के
पड़ गए है बिम्ब
जिनसे लिखने से कागज़ पर
सिर्फ निशाँ बन जाते है
अब कोई रंग नहीं उभरता //

बुधवार, 30 जनवरी 2013

प्री-पोस्ट

भटकती केन्द्रीयता के बीच
विखंडित वर्जनाएं और
लिजलिजेपन की दुर्गंधियाँ
अन्स्थल में भटकती आवाजें
कंदराओं से आती मुक्ति वीणा
सौन्दर्य में भीगी बालाएं
और भिन-भिनाते मुद्रा के खुले मुख
सपाट दूर विद्रोहों से होकर
निकला समुद्र का ज्वार
और अभिशप्त  प्रेतों की आत्मा
यौनिकता के रूढ़ प्रतिमान
जिसमे परोसा अद्धुनातन विचार
क्षणिक सरोकार में परिभाषित
ललायित नए सन्दर्भ गढ़ने  को
पिछले दरवाजे की खड़-खड़ और
आता ध्वजों पर भर के ग्लोब
दबे पाँव सरकते-सरकते आकर
जाता है मिल परछाई में
लुप्त होकर मानो अनुनाद
दिग्भ्रमित केंद्र और परिधि
शंका उठती जिसमे स्थानीयता
केंद्र की उठती भीषण लपटें
चला जा रहा उसी पथ पर
पंथवरों की तरह सर झुकाएं.....
शक्तिपुंज में खड़ा हाँथ जिसमे
व्यक्ति, संशय, अनास्था, मूल्यहीनता,
व्यवस्था विरोध, अतीतविमुखता
बुद्धिवाद में एनलाइटेंमेंट प्रोजेक्ट
देवता है मानव निर्मित
पृष्ट में जो है खड़ा
बिम्ब, प्रतीक, अन्तश्चेतना,
भविष्य और क्षय  से पूरित
रेंगता, निख्ड़ता इसलिए अब स्वायत
गुणसूत्रों में तैरता मृत्युगीत
लेखक, कला, विचार, इतिहास
करते बारी-बारी अपने पिंडदान
मात्र संरक्षित ध्वनि शब्द
आते पल-प्रतिपल निकट और निकट
बढ़ता हुआ हाहाकार स्तब्ध
अनिश्चित , चीज़ों का बाज़ार
दिखती परछाई भी विशाल
और छोटा दिखता प्रेत
ग्लोबल मैन, तीन मकारों की दुनिया
नसों में होता पॉवर शिफ्ट
मर्द वियाग्रा और नारी कंडोम थामे
यूटोपिया से डिसटोपिया (एंटी-यूटोपिया)
ब्लैक लिटरेचर से ब्लैक वीमेन टॉक
 डेथ ऑफ़ मनी से मास कल्चर
आइडियोलॉजी में ग्लोबल मैन
अकड़ रहा है खाकर चमत्कारी मैगी
रेस में सुपर टेक्नोलॉजी
पोस्ट स्मोकटेक सिविलाइज़ेशन
देह और प्रेत को बना प्रोसुमर
देह सिखाता श्रम और
देता सेवा प्रेत को
बनाकर परछाई विराट वीभत्स
सारे रेवोलुशन हैं ख़त्म
मॉडर्न बौद्धिक की बनाई परछाई
देखता रेटिना की नसों को तानकर प्रेत
हो गया लेज़ का चिप्स
खाकर देह जीरो फैट
मल्टी विटामिन-मिनिरल टेबलेट
बंद है विखंडन की शीशी में
जिसमे देह और प्रेत
उड़ सकते है उड़नतश्तरी में
बिना कुंडली जागरण के
क्योंकि भटकती केन्द्रीयता के बीच
विराट वीभत्स परछाई ने
धरती को सेंटर ऑफ़ मास चिन्हित किया है ////
 

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

कोल्ड नाइट

यूँ ही जागा रहा रात भर
बेचैन काली रात पूस में
ठण्ड से भी ठंडी रात
सडको पर सिर्फ दिखते है मटियाले
बनकर मेरे गिरेबान का कॉलर
बचाते मुझे सर्पतों की सुख्हंडों से
करके मुझे अकेला बिलकुल
क्योंकि उन्होंने कर दी घोषणा
अब तुम बहोगे १४४ धारा में
वर्ना पूर्णिमा के दरिन्दे तुम्हारे
गरमा- गर्म गोश्त को निकाल
लेंगे तुम्हारे कॉलर से
चिल्लाना तो बिलकुल भी न 
नहीं तो सेंक लेगे बार के कौड़ा
खड़ी धूप के कोहरे में गाँधी टोपीवाले नागरिक
और रंग बिरंगे प्रचारों के
साथ ही , तुम जाओगे बन 
टी आर पी के वन नाइट स्टार
और घर पर बैठे तिरोहित जन
गर्म चाय-पकोड़ों के साथ
तुम्हारी गंधैली ज़िन्दगी की
बदबू पर , करके इन्द्रिय बंद
जायेंगें बन गाँधी जी के बन्दर
जिनके होने का एहसास होता है
उनके सीने के फूलने पचकने से मात्र ...
पर तुम डरना नहीं क्योंकि
तुम्हारे लोथड़ों और खून
का डी एन ए आयोगों और समितियों
की स्याही में नीला दिखेगा ,और
गणतंत्र में तुम बन जाओगे काले
तुम्हारी स्निग्धता और स्वतंत्र
होने की इच्छा अब भी काली है
क्योंकि तुम्हारे देश का कानून
आज भी चलता है औपनिवेशिक 
दासता के ढर्रे वाली धर्मावली पर
और तुम्हारी भयानक आत्मा को
मिल न सकेगी मुक्ति न्यायाधिकरण में भी
चाहे करो कितने भी पिंड दान .........
जानते हो क्यूँ ....क्योकि मोक्ष के लिए भी
सब ठीक होना जरुरी है
और ठीक होने के लिए
तुम इतना तो ख़याल रखो कि
जब इस गणतंत्र में आँखे खोलो
तो तुम जन्मांध बन जाओ 
बना लो अपने दिल-फेफड़े को साउंड प्रूफ
और कानो में कुछ भी भुरभुराए तो
कान में डाल लो पिघला हुआ सीसा
और चेतन का सी टी स्कैन करके
बना दो रिपोर्ट कि तुम कोमा में हो ......
क्योंकि यूँ ही जागता रहा रात भर ............./////////////////