सोमवार, 15 जुलाई 2013

बेखबर

मेरी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे सुबह की ऒस बैठ जाती है 
पत्तों के कोरों पर,

उसकी चाहतें बिलकुल वैसी है 
जैसे हवा में उड़ता परिंदा 
जो उड़ जाना चाहता है उस पार,

हम दोनों की चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवाओं में तैरने के बाद ऒस
मिल जाती है असीम गहराइयों में
और परिंदा थक जाने के बाद
आ जाता है ज़मी पर
सुकून की चादर ओढने की तैयारी में,

इसी मेरी-तुम्हारी-हम दोनों
के बीच होते हुए भी
इन चाहतों के दरम्या
मैं बन जाता हूँ तुम्हारा, और
तुम मेरी निपट अपनी.....///// 

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