सोमवार, 15 जुलाई 2013

पहेली

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ बात मुझे कह लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो

तुम यादों में रह जाते हो
जैसे हरी दूब के किनके
दांतों में फंस जाते है ...
रफ्ता-रफ्ता खिसक-खिसक के
वो थोड़ा सा जो सताते है,

गहन क्षणों में भी तुम
दबे पाँव चले आते हो
कहते हो कि अब जाते है
पर रात तलक तुम यूँ ही क्यों
ओंठों पर मेरे मुस्काते हो

तुम अपने से लगते हो
जैसे यादें हो जाती है
बढ़ते चलते इस रस्ते पे
तुम साथ मेरे चलो साथी

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ बात मुझे कह लेने दो...////

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें