सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

चीज़ें

कमरे में रखा फूलदान
रोज़ नए-नए फूल लगते
मेरे उठने से पहले वो
अपनी जगह पा चुके होते है
जैसे कहते हो, आज तुम
फिर से देर कर गए /

फैले विस्तृत आकाश में
प्रछन्न मेघ मालाएं
रात्रि में काली स्लेट पर
चांदनी का टुकड़ा
यह सब नियत आ ही जाते है/

दराज में पड़ी किताबें अपनी
जगह पा लेती है और
मेरी कलम में स्याही
मेरे लिखने के लिए हर रोज़/

सब कुछ वैसा ही है जैसे
होते थे तुम साए में/
पर, पिछली बारिश में सब
गया धुल कर बह .........

फूलदान में सूखे फूल
स्लेट पर आमावश
और किताबों के पन्ने अब
खुली खिड़की की खड़खड़ाने से
लगे है फटने, साथ ही
कलम में सूखी स्याही के
पड़ गए है बिम्ब
जिनसे लिखने से कागज़ पर
सिर्फ निशाँ बन जाते है
अब कोई रंग नहीं उभरता //

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें