हजारों कदमों के बीच
उड़ती धूल और गन्दगी के बीच
लपलपाती है लाखों मक्खियों की ऒर
जैसे मानो उनसे कर रही हो
छिना-झपटी या मनमनुहार
कि मैं भी हूँ ईश्वर की निर्मिति
या समझो तो डार्विन के विकास की नियति
इस बीच वो ताड़ के दो बार
आ चुकी है गली के कोने में पड़ी
कार के नीचे,
जहाँ नौ जोड़ी आँखें
टकटकी लगाये सकपकाई सी
आते जाते कदमों की ताल और
टायरों की रगड़ के बीच कर रही होती
इंतज़ार .......
तभी चौधरी दूध की थैली
लेकर निकलता है रोज़ की तरह
काले रंग की खोज में और
रह जाती है फिर से वो
अभागी या शास्त्रों के भाग से अछूती
थक हार कर अपने खून का ही रंग
कर देती सफ़ेद जिससे
वो निभा सके अपना धर्म
साथ ही पा ले तमाम धर्मों से मुक्ति और
अपने नौ नवजात बच्चों की आँखों की चमक
और अपनी एक आँख में संतोष तो
दूसरी आँख में अगली लड़ाई की चित्रावली ..///// वित्रि
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