कठिन क्षणों में
जीवन का उद्भास
ये प्रश्न खड़ा करता है
मुँह बाए .....
कि शेर और भेड़िये
देखतें है कैसे एक दूसरे को ?
और उनकी आँखों में लहू
होता है या मौके की तलाश ?
कि कब दूसरा पिछड़े और
उतार दे अपने नुकीले दांत
सामने वाले की गर्दन में गहरे /
मेरे चारो तरफ नुकीले दांतों की
बड़ी-बड़ी संरचनाएं लहू और मौके की
छिना झपटी में खड़ी चमक रही है /
जिनमे मेमने की तरह जान
अपनी जान बचा लेने की जुगत में
लगा रहता है हर इंसान
अपनी तरह की इस बन्दर बाँट में //
जीवन का उद्भास
ये प्रश्न खड़ा करता है
मुँह बाए .....
कि शेर और भेड़िये
देखतें है कैसे एक दूसरे को ?
और उनकी आँखों में लहू
होता है या मौके की तलाश ?
कि कब दूसरा पिछड़े और
उतार दे अपने नुकीले दांत
सामने वाले की गर्दन में गहरे /
मेरे चारो तरफ नुकीले दांतों की
बड़ी-बड़ी संरचनाएं लहू और मौके की
छिना झपटी में खड़ी चमक रही है /
जिनमे मेमने की तरह जान
अपनी जान बचा लेने की जुगत में
लगा रहता है हर इंसान
अपनी तरह की इस बन्दर बाँट में //
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