मंगलवार, 10 सितंबर 2013

लौटा हूँ इन्हीं हालातों में

कठिन क्षणों में
जीवन का उद्भास
ये प्रश्न खड़ा करता है
मुँह बाए .....
कि शेर और भेड़िये
देखतें है कैसे एक दूसरे को ?
और उनकी आँखों में लहू
होता है या मौके की तलाश ?
कि कब दूसरा पिछड़े और
उतार दे अपने नुकीले दांत
सामने वाले की गर्दन में गहरे /
मेरे चारो तरफ नुकीले दांतों की
बड़ी-बड़ी संरचनाएं लहू और मौके की
छिना झपटी में खड़ी चमक रही है /
जिनमे मेमने की तरह जान
अपनी जान बचा लेने की जुगत में
लगा रहता है हर इंसान
अपनी तरह की इस बन्दर बाँट में //

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें