बुधवार, 28 अगस्त 2013

तीनों के बीच

मैं, मोह, और मृत्यु
तीनों के बीच
जीता हूँ......

आत्म, जग, पर
तीनों के बीच
मलता हूँ आँखें...

युद्ध, शांति, और संशय
तीनों के बीच
पाता हूँ खुद को ...

निवास, निर्वासन और निर्वाण
तीनों के बीच
खोजता हूँ पहचान

रोटी, कपड़ा और मकान
तीनों के बीच
कोशिश हूँ करता
उन तमाम तीनों का
मतलब समझने का....
जहाँ तीन मकारों के परे भी
दुनिया पल रही है
बढ रही है /////

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