बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

ख़त

बहुत दिनों से 
तलाश रहा था वो ख़त , 
जो तुमने लिखा था 
जिसमे तुमने बताई थी 
बहुत सी बातें 
कि कब तुमने खरीदी थी 
मोगरे वाली धूप 
कब तुमने की थी 
चाँद से शिकायत 
कब तुमने काट ली थी 
उंगलियाँ बेख्याली में , 
और कब तुमने शकुंतला पढ़ते हुए 
भिगो दिया था सिरहाने को
और हाँ ...वो भी जिसमे 
तुमने मुंह फुला के लिखा था 
कि तुम कुछ नहीं लिखते .../

खोजते-खोजते 
उस धूप की महक
उस गप्पी चाँद
और वो बेरहम धार 
जो साल रहा था अन्दर-अंदर
स्मृतियों को कहीं हल्के से निर्मम
सबसे मिल आया, पर
अभी बाकी है एक जगह 
वही सिरहाना, जहाँ तुमने 
बचा के छोड़ रखी है
ज़िन्दगी की नमी ..../////   वित्रि

                         
  
  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें