मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

अश्क-ऐ-दास्ताँ


इन अश्को में गम का फ़साना
इन लफ्जों पर गम की कहानी
एक मुसाफिर तन्हा सा था
इस गम के अंधेरो में सहमा सा था
ओंस की पहली बूंद गिरे जब
उषा की पहली किरणों के संग
यादो की गहरी खाई से
एक गम का फ़साना फिर से उभरा
वह इन आँखों में फिर से उतरा
सोचा की बहने दे इनको
कुछ तो यादें कम होगी/

शाम हुई तो देखा मैंने ,फिर से घेरा
तन्हाई ने इन अश्को को
                 यादो के चंगुल में /
पर सुर्ख हुए जाती थी आँखें
ये अश्क भी जब्त न होते थे
मुमकिन सब कुछ था लेकिन
बेबस केवल हम थे /

मुसफ़िर  थे हम तो उनके मुल्ताज़िर में
काफ़िर वो निकले
तो हम क्या करते ?
पर , यह दिल की खलिश थी
इन आँखों में था उभरा,
जिन ख्वाबो का खून हुआ था
उन ख्वाबो का अश्क गिरा था /

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें