गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

वादियों की चाह

अँधेरी इन वादियों में  
दूर तलक थी एक धुंधली उजयाली
उस उजयाली में एक
नहाई हुई अप्सरा
लगती वो थी /
उस शोख हसीना  के अधरों पर
उषा की ठंडी ओस पड़ी थी
उसके पहलु के साए तले, जैसे
 ये धरा धरी सी थी ,

पाँव धरे जब बजे पैजनिया
जैसे कोई देवी का तार बजे
देख उसे छाई मदहोशी
 मन भी मेरा हरसाज रहा
देख तब्सुउम के जरजोश
इस तन को न था,  एक पल का होश 
आसमा  में भी छाई लाली
मन ये मेरा क्यों ऐसे ललचाया
जैसे हो कोई बाल खिलौना /

अर्ज़ यही होती हर बार 
होश  न आये मुझको एक बार
ऐसे बुनु मैं इन ख्वाबो का जाल
पर, हाल भी ऐसा हुस्न भी ऐसा
आग लगी थी चारो ओर, 
हर फिजा भरी थी हिम पवनो से
 फिर भी .
उसकी और मेरी सांसे थी 
उष्ण ..... /

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