बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

मनुष्य की शांति !

इस तंत्र में सब अनुकूल है
परन्तु यह आज एक छलावा मात्र
रह गया है हमारे बीच
हर पल या कहे,
हर समय का अंश
जिसमे दिल धड़कता है,
हम दो पैरो के प्राणी
अपनी सार्थकता
सिद्ध करने के भुलावे में
इस औधोगिक यांत्रिकता के धुएं का
हो रहे है शिकार ,
अपनी उत्पत्ति या कहे अपने अस्तित्व गाथा को
हम रहे परोस
एक बाजारू ढंग से
आज हम अपने प्रभु को भी
किसी लव स्टोरी फिल्म के
अत्याधुनिक संगीत के रूप में
शोर के आडम्बर में करते है याद
मैं कहूँ  कि इस आध्यात्मिकता में
रह गई कहाँ  
वह शांति
जिसे मैं ढूंढ़ता इस यांत्रिकता
व दिखावे कि इस अंधी दौड़ में
आज मनुष्य मात्र संतुष्टि
वाक्य ,ग्रहण नहीं करता
अपितु पार का जाना चाहता
सर्वोच्च की भी सीमा
जहाँ वह और केवल वह  हो
जहाँ उसके समरूप मात्र
उसकी हो छाया, शायद
यही है आज के यांत्रिक
व बाजारू मनुष्य की शांति
शांति !
शांति ! 
शांति !

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