गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

उजाले का सच

कुछ  छण रुक जाना
मेरे सच का था आना
शांत मन की उथल-पुथल में  
इस जग का कोलाहल
सृष्टि की निमित्त में
ढूंढता , एक पत्ता
जो इशारा करता हो
हिलाकर खुद को , और
हवाओ को
जीवित होने का , पर
शांत था जग , और
उसमे मैं  ,
अकेला
विचार करने के लिए
सच में छिपे उस अंधकार को
जो उजाले में ,
जब आँखें चौधिया जाती है
घोंट देता है ,
सब कुछ
जो मैंने देखा
खुली आँखों से /

वादियों की चाह

अँधेरी इन वादियों में  
दूर तलक थी एक धुंधली उजयाली
उस उजयाली में एक
नहाई हुई अप्सरा
लगती वो थी /
उस शोख हसीना  के अधरों पर
उषा की ठंडी ओस पड़ी थी
उसके पहलु के साए तले, जैसे
 ये धरा धरी सी थी ,

पाँव धरे जब बजे पैजनिया
जैसे कोई देवी का तार बजे
देख उसे छाई मदहोशी
 मन भी मेरा हरसाज रहा
देख तब्सुउम के जरजोश
इस तन को न था,  एक पल का होश 
आसमा  में भी छाई लाली
मन ये मेरा क्यों ऐसे ललचाया
जैसे हो कोई बाल खिलौना /

अर्ज़ यही होती हर बार 
होश  न आये मुझको एक बार
ऐसे बुनु मैं इन ख्वाबो का जाल
पर, हाल भी ऐसा हुस्न भी ऐसा
आग लगी थी चारो ओर, 
हर फिजा भरी थी हिम पवनो से
 फिर भी .
उसकी और मेरी सांसे थी 
उष्ण ..... /

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

लाल और काली

ये रास्ता जो सड़क से
बाँए फिर दाँए फिर दाँए
और फिर बाँए.............
एक धमनियों के तंत्र कि भांति
मुझे और .......... लगता है
मेरे जीवन के सामान
एक न समाप्त होने वाला
प्रश्न है ?
जग कहता है समाप्त !
पर सच कहूँ
ये भुलावे , धोखेबाजी
नहीं आती मुझे
क्या इस मांस के लोथड़े
का छिछला हो जाना ही
लाल होने का है प्रतीक ?
कबीर भी लाल होते है
अस्तित्व उनका भी होता
है लाल ,पर
मुझे तो दिखता
नहीं कही लाल
बल्कि  दिख पड़ती वही धमनियां
काली..............!!!!! 

मनुष्य की शांति !

इस तंत्र में सब अनुकूल है
परन्तु यह आज एक छलावा मात्र
रह गया है हमारे बीच
हर पल या कहे,
हर समय का अंश
जिसमे दिल धड़कता है,
हम दो पैरो के प्राणी
अपनी सार्थकता
सिद्ध करने के भुलावे में
इस औधोगिक यांत्रिकता के धुएं का
हो रहे है शिकार ,
अपनी उत्पत्ति या कहे अपने अस्तित्व गाथा को
हम रहे परोस
एक बाजारू ढंग से
आज हम अपने प्रभु को भी
किसी लव स्टोरी फिल्म के
अत्याधुनिक संगीत के रूप में
शोर के आडम्बर में करते है याद
मैं कहूँ  कि इस आध्यात्मिकता में
रह गई कहाँ  
वह शांति
जिसे मैं ढूंढ़ता इस यांत्रिकता
व दिखावे कि इस अंधी दौड़ में
आज मनुष्य मात्र संतुष्टि
वाक्य ,ग्रहण नहीं करता
अपितु पार का जाना चाहता
सर्वोच्च की भी सीमा
जहाँ वह और केवल वह  हो
जहाँ उसके समरूप मात्र
उसकी हो छाया, शायद
यही है आज के यांत्रिक
व बाजारू मनुष्य की शांति
शांति !
शांति ! 
शांति !

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

बाकी

अभी तो मैं चला हूँ
अभी तो राह है अधूरी,
अभी तो कारवां बना है
अभी तो मंजिले है बाकी
कुछ सोच कर किया था
पर, गुमां है बाकी
अभी तो कश्तियाँ चली है 
अभी साहिल पे लहरों का आना है बाकी  
अभी हलचल हो रही है
अभी कुछ बदलने लगा है/

सरज़मी पर खून की बुँदे है गिरी
आज उन्हें पानी बनना है बाकी
हर तरफ सब बदलने लगा है , लेकिन
आदमी की फितरत बदलना है बाकी
हर तरफ कुछ नया करना है बाकी
पर, उससे पहले नई सदी का 
नया आदमी आना है बाकी  /

अश्क-ऐ-दास्ताँ


इन अश्को में गम का फ़साना
इन लफ्जों पर गम की कहानी
एक मुसाफिर तन्हा सा था
इस गम के अंधेरो में सहमा सा था
ओंस की पहली बूंद गिरे जब
उषा की पहली किरणों के संग
यादो की गहरी खाई से
एक गम का फ़साना फिर से उभरा
वह इन आँखों में फिर से उतरा
सोचा की बहने दे इनको
कुछ तो यादें कम होगी/

शाम हुई तो देखा मैंने ,फिर से घेरा
तन्हाई ने इन अश्को को
                 यादो के चंगुल में /
पर सुर्ख हुए जाती थी आँखें
ये अश्क भी जब्त न होते थे
मुमकिन सब कुछ था लेकिन
बेबस केवल हम थे /

मुसफ़िर  थे हम तो उनके मुल्ताज़िर में
काफ़िर वो निकले
तो हम क्या करते ?
पर , यह दिल की खलिश थी
इन आँखों में था उभरा,
जिन ख्वाबो का खून हुआ था
उन ख्वाबो का अश्क गिरा था /

राष्ट्र-विधाता और मिट्टी का घर

इस राष्ट्र के आधे से ज्यादा
विधाता मिट्टी के घर में
कर रहे है अपने करो से
अपने भूत ,वर्तमान .भविष्य  का निर्माण
 मन भी इनका मिट्टी के
गीले लोंदे सा है
क्योंकि यह रहते है मिट्टी के घर में
आज अपनी प्रतिबद्धता दोहरा रहे
अपने बचपन में
अपनी किस्मत आजमा रहे
अपने प्रचंड सत्व से
राष्ट्र को जगा रहे
क्योंकि राष्ट्र का भविष्य
पल रहा,
 मिट्टी के घर में /

सत्य का सफ़र

आँखें खुल कर बंद हुई जो 
ऐसा लगा की शुरू हुआ और ख़त्म हुआ
जीवन का सफ़र तन्हा शुरू
होकर तन्हा ही ख़त्म हुआ/
बचपन में इसकी रंगरेलिया समझ न,
सिर्फ देख सका
नव यौंवन में समझ सका
घट-घट जब पार हुए , नीरस ,
पर नव जीवन के इस
पनघट की शाम को समझना
शुरू किया और ख़त्म हुआ/

रोज़ सुबह आते है इन गलियों
पर मिट्टी के पुतले निर्जीव
और साथ में होते चार पुतले सजीव
जो कोशिश कर उसे उठाते
राम सत्य का जाप लगाते
प्रण कर आये हो लगता की
उसे सत्य बनाने को
पर, अग्नि को सौप उन्हें लगता
कि शुरू हुआ और ख़त्म हुआ/

जीवन के काल चक्र का
नर्तन भी सब एक सा है
सुबह की नन्ही परियों सी
कोमलता की गुटकी सी
तन-मन में जीवन प्रवाह सी, लगती ,
धीरे-धीरे जब दिन चढ़ जाता
यौवन भी फल-फूल है जाता
रक्त उष्ण हुए लगता है
पर,द्वितीय पहर ही दिन
जब थोडा ढल जाता ,
जीवन, अर्ध पर्व सुधाकर
के जीवन से कहलाता
रात्रि का रूप जब उभरने होता
जीवन का जग मोहन रूप अब
नीरस सा लगने लगता
रात्रि के हर सन्नाटे में
वायु के हर परत के
घर्षण कि आवाज से
जीवन भी सत्य होकर
काल-गाल से शुरू हुआ
और ख़त्म हुआ सा लगता है /

सपना जो मैंने देखा


उड़ता हुआ मेरा मन
एक रोज़ जब रोया था
कुछ सपनो के संग कुछ अरमा टूटे
कुछ खुशियों के भी घर टूटे
अल्फाज पुराने लगते थे
कुछ साल पुराने लगते थे
तब तो कुछ कहना था मुश्किल
वह आज  नवल से क्यों लगते है ?
अरमानो का एक उड़न खटोला
पल- पल अपने रूप बदलता
 मेरे भी थे कुछ ऐसे अरमा
जो घुट-घुट के रोया करते थे /
जब उस
नव यौंवन के पनघट से
छन -छन की आवाज उठे
उड़ता हुआ मेरा मन
उस रोज़ तब रोया था /

अचेतन

मेरी महफ़िल के गीत पुराने
आज नवल से क्यों लगते है ?
एक जो था फ़साना मेरा
आज पराया क्यों लगता है ?
मेरी महफ़िल के ..........
तेरी वो गलिया तेरे चौबारे 
एक वो नज़ारे एक वो इशारे
कहने को मैं कहता क्या
जो महफ़िल के रंग जमाते /
आज नवल से क्यों लगते है 
मेरी महफ़िल के गीत पुराने ?
जीवन तेरा मेरी छाया है
कैसे इससे जुदा हो जाऊ
लाख मनाऊ फिर से आऊ
तेरी महफ़िल का जाम मैं पाऊ
गहराई तेरी छुना चाहा
पनघट से क्यों लौट मैं आया
तेरे अरमानो का दीप जलाया
फिर भी अँधेरा क्यों लगता है ?
मेरी महफ़िल के गीत पुराने
आज नवल से क्यों लगते है ?