शुक्रवार, 2 मई 2014

अहम् ब्रम्हास्मि

इतिहास लिखा जा चुका था 
या इतिहास लिखा जा रहा है 
या कह दूँ कि 
अभी लिखा जायेगा 
इतिहास, 
किसी बड़े से घर में रहते हुए 
इंसान रोज़ जीता है एक इतिहास 
जिसमें जगहें छोटी होती जाती हैं 
क्योंकि इंसान बड़ा होने की कोशिश में है
कभी दूसरों या कभी खुद के लिए
वो नहीं उठाना चाहता है खतरा
मात्र इंसान बने रहने का ....///
श्वेत रक्त में इतिहास रंजित है
जिसकी अँधेरी लिजलिजी दुर्गंधियों में
रहते हुए जीवित मनुष्य
आज तिलचट्टा बन बैठा है
जो वर्त्तमान को
इतिहास की विष्टि पर
अपने षडहस्तों के
आभासी मुनाफे में
रोज़ एक फीता कम कर देता हैं, व
भविष्य का संसार है चाहता रचना
संयोग से अंधरे में परछाई
न लम्बी होती है न छोटी
एक भ्रम मात्र
अहम् ब्रम्हास्मि ....../////

पानी

पानी हूँ 
बदलते मौसम में 
हूँ बदलता रहता 
मगर अपनी नियति में 
भरता नहीं कोई रंग //
तुम धूप बन जाओ 
या सर्द हवाओं के थपेड़े
या मेरे ताप को बना लो
अपने रगों में बहता दरिया
मगर अपनी आखिर में
छोड़ रखता हूँ
तुम्हारे साथ गुजरे हर वक़्त
और कोशिश में एक नमी
जिसमें मैं,
तुम्हें कर सकूँ महसूस
और दे सकूं खुद को
तुम्हारा रंग
तुम्हारा आकार
तुम्हारी बातों को उनके अर्थ /

दुविधा

कई बार खोजता हूँ 
यहाँ-वहाँ तमाम अनजान चेहरों में, 
दो अनजान लोगों की ख़ुशी को देख, 
मैं भी मुस्कुरा लेता हूँ हौले से कभी, 
सन्नाटों की तहों में दबी कई रातों में 
जब आँखों की दोनों भौंए सिकुड़ी रहती हैं 
फिर-फिर घंटों तलाशने के बाद भी 
यह तय नहीं हो पता कि मैं किस 
अमूर्त को मूर्त बनाने की कोशिश कर रहा हूँ
या बिलकुल इसके उलट,
तब अक्सर ये सवाल खुद ही खड़ा होता है कि
उसे उसके रंग से पहचानूं
या उसकी गंध से ?

आदिम इच्छा

सन्नाटों से गुजरती हवाओं से 
कभी तुमने बातें की हैं ?
बहती नदियों के किनारे बैठकर 
कभी तुमने सुनी है उनकी दास्तां?
चमकते तारों में खोये चाँद से 
कभी तुमने पूछा है उसका ठिकाना ?
या बेख्याली में चलते हुए 
कभी तुमने ज़िन्दगी को किया है महसूस?
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कभी वक़्त मिले तो लिखना मुझे
उन हवाओं की बातें
उन नदियों की दास्तां
उस चाँद का ठिकाना
और हाँ, देखो!
उस ज़िन्दगी को न भूल जाना
क्योंकि थोड़ी बेख्याल है ये ////

इन्सान

मैं फिर चलूँगा 
जब तुम दोगे मुझे आखिरी आवाज़ 
मैं फिर उठूंगा 
जब तुम लगा दोगे आखिरी ताकत 
मैं फिर बुनुगा सपने 
जब तुम फेरोगे आखिरी हाथ 
मैं फिर मुस्कुराऊंगा 
जब तुम कहोगे आखिरी शब्द 
मैं फिर जीऊँगा 
जब तुम ज़िद्द करोगे 
तमाम मुश्किलों में भी
हवाओं को अपनी रगो में
कैद करने के लिए......//

ख्वाबों का सौदा

मैंने ख्वाबों के बहुत से 
सौदे किये हैं अब तक ,
जब बचपन में चौक से गुजरता 
तो गुब्बारे वाला मुझसे करता था सौदा,
और ख्वाबों की कड़ी दोपहर में तो,
न जाने कितने दिल रोज़ करते थे सौदा, 
आज जब ख्वाबों ने मुझसे 
सौदा करना छोड़ दिया है 
या कहूं कि वो अब आते नहीं ।
तो सोचता हूँ कि अब ख्वाब
बचे नहीं या कि मैंने सारे सौदे कर लिए ? ......
मालूम करने निकला तो
लगा कि ख्वाबों में तो.... था मैं ,
तो सौदा किसका ?
क्योंकि उस गुब्बारेवाले के
बिक गए हैं सारे गुब्बारे , और
अब ख्वाबों में कड़ी दोपहर नहीं होती //////

यात्रा

रोज़ की हड़बड़ी में 
तैयार होता हूँ पहुँचने के लिए वहाँ, 
जहाँ पर रास्ते हो जाते हैं खत्म 
क्योंकि मैं लौटना चाहता हूँ 
बिना किसी हड़बड़ी के 
आहिस्ते-आहिस्ते.......,

मेरे साथ चलने वाले 
होते है, बहुत से अनजान चेहरे
जिनकी गर्दन से जुड़े हाथ
थामे रहते है स्टैंडिंग होल्डर
जिससे उनको भरोसा होता है कि
वो पहुँच जायेंगे, जहाँ वो चाहते है।
मगर उस क्रम में उनकी आँखें
होती है चौक्कनी कि कब
बगल वाले को प्रतिस्थापित कर
हो जाये खुद काबिज़
जैसे उस होल्डर हो हासिल करना
हो स्वयं जीजिविषा का प्रश्न /

मेरे साथ होता है पूरा आज
जिसमें कोई अपनी सीट
दे रहा होता किसी जरूरतमंद को
तो कोई खुद को संतुष्ट कर लेता है
दो के बीच आड़ा-तिरछा घुसेड़ कर ,
उनमें से कुछ तो खड़े होकर
इन्द्रियों का आभासी सुख लूटते हैं ,
किसिम-किसिम का लोक-संसार
होता है मेरे आस-पास ,
जिसमें रास्तों की बातें नहीं होती
और न कोई चाहता है लौटना
बल्कि होती हैं मात्र मंजिलें ही मंजिलें,
क्योंकि रास्ते कभी खत्म नहीं होते शायद
और न हड़बड़ी। ....