रविवार, 19 जुलाई 2015

कविता शीर्षक :- तन्हाई

कहीं दूर खुद से 
गुजारी हैं अब तक
तन्हाइयों में कई रातें
यह नहीं कि
निहारते रहे
चाँद और तारों को आसमाँ में
बल्कि दस बाई बारह की
छत पर घूमती तीन पंखुड़ियों को
जो कभी अलग नहीं दिखतीं
अक्सर ज़िन्दगी को
उन चारों कोनों से मिलाते
और ज़िन्दगी का एक घेरा
हैं बनाते मगर धुंधला
जैसे ज़िन्दगी हो हूबहू ऐसी
जैसे एक धुंधला वृत्त
जो बाहर से पूरा गोल
आता है नज़र मगर
इंतज़ार करने पर रह जाते हैं
तीन दिशा-सूचक
जैसे सांस लेने और छोड़ने के
बीच भी कुछ बचा रह जाता है
और शायद खोजता हूँ वहीँ
वह तमाम वजहें
जिससे "मैं" के रह सकूँ पास ////

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