रविवार, 19 जुलाई 2015

जब भी अकेले से बातें करता हूँ 
शब्द निःशब्द से होते हैं 
जिनके अर्थ बेहद होतें हैं 
कभी भावुक कभी विचारशील, 
चारों तरफ बहती है इक नदी 
और पता हूँ खुद में इक
शिला-खंड ,
जो लगातार क्षरित हो रहा है
नदी बढ़ती जा रही है
शब्दों में ध्वनियाँ झंकृत हो रही हैं
मैं अकेलेपन से हो रहा हूँ
निर्वासित
अर्थ-बंध खुल रहे हैं ,
अब अकेले बातें नहीं हैं /

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