रविवार, 19 जुलाई 2015



आधी रात बालकनी में खड़े होकर
गली के नुक्कड़ पर मेरी परछाई
मुहल्ले के लोगों का करती रही इंतज़ार
लेकिन नींद को घेर रखा था
उसी चौराहे पर खड़े जानवरों ने 
जो उसकी अजनबी आकृति से
या तो थे आक्रांत या कर रहे थे
नींद भी वहीँ खड़ी थी कांपते पैरों से
उसने जैसे तय कर लिया हो
कि फिर नहीं लौटेगी कभी बालकनी में
जबकि यह तय था कि
होगा उसका शिकार अब
किसी आदमखोर से नहीं
बल्कि किनारे की बजबजाती नाली के ऊपर
सैकड़ों सूक्ष्म रक्त-पिपासु हथियारों से,
देखती रही बार-बार गली के भीतर
पडोसी के रोशनदान से आती रौशनी
गली के पहरेदार आतुर थे
अपने विरोध में खड़े अपने विपक्ष के,
फिर भी नींद को इंतज़ार था परछाई का
जिसके चेहरे में कुछ भी नहीं था स्पष्ट
बस एक काला-सा धब्बा-सा !!!
कहाँ हैं वह आँखें जो मेरी थीं !!!
अब नींद ज़्यादा भयभीत थी
आस-पास तैरती परछाइयाँ
उनकी आँखें ज़्यादा अजनबी थीं ,
नींद ने फिर से बालकनी में देखा
परछाई अब भी वहीँ खड़ी थी
नींद ने फिर से देखा पडोसी का रोशनदान
उसके शीशे में नज़र आ रही थी परछाई
औ आखिर में नींद ने कूच कर दिया
परछाई खड़ी रही इंतज़ार में।

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