एक जगह से दूसरी जगह
जब भी जाता हूँ मैं
और करता हूँ खुद को
स्थापित अनेक साधनों से
हो जाता हूँ निर्वासित,
कभी सुबह की धूप से
तो कभी रात की शीतलता से,
दो जगहों के बीच
हर बार होती हैं संक्रमणशील जगहें
जहाँ मेरे चेहरे और
बालों का रंग , जाता है बदल,
यही वे जगहें हैं जहाँ
मेरे अंतस की बकोईयाँ
तलाशती हैं सहारे और गतिशीलता
जब तक की लदकर
लटक न जाएं,
स्थापित और निर्वासित
होने के क्रम में
आणुविक संकुचन से
मैं सुकुड़ता और फैलता हूँ रहता
जैसे एक जगह से दूसरी जगह
संक्रमण के दौर में
दूरियाँ क्रमशः होती है
निर्वासित /
और करता हूँ खुद को
स्थापित अनेक साधनों से
हो जाता हूँ निर्वासित,
कभी सुबह की धूप से
तो कभी रात की शीतलता से,
दो जगहों के बीच
हर बार होती हैं संक्रमणशील जगहें
जहाँ मेरे चेहरे और
बालों का रंग , जाता है बदल,
यही वे जगहें हैं जहाँ
मेरे अंतस की बकोईयाँ
तलाशती हैं सहारे और गतिशीलता
जब तक की लदकर
लटक न जाएं,
स्थापित और निर्वासित
होने के क्रम में
आणुविक संकुचन से
मैं सुकुड़ता और फैलता हूँ रहता
जैसे एक जगह से दूसरी जगह
संक्रमण के दौर में
दूरियाँ क्रमशः होती है
निर्वासित /
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें