मंगलवार, 10 सितंबर 2013

लौटा हूँ इन्हीं हालातों में

कठिन क्षणों में
जीवन का उद्भास
ये प्रश्न खड़ा करता है
मुँह बाए .....
कि शेर और भेड़िये
देखतें है कैसे एक दूसरे को ?
और उनकी आँखों में लहू
होता है या मौके की तलाश ?
कि कब दूसरा पिछड़े और
उतार दे अपने नुकीले दांत
सामने वाले की गर्दन में गहरे /
मेरे चारो तरफ नुकीले दांतों की
बड़ी-बड़ी संरचनाएं लहू और मौके की
छिना झपटी में खड़ी चमक रही है /
जिनमे मेमने की तरह जान
अपनी जान बचा लेने की जुगत में
लगा रहता है हर इंसान
अपनी तरह की इस बन्दर बाँट में //

बुधवार, 28 अगस्त 2013

अ- चेतन

बहुत कुछ है दरम्याँ
उजालों में ख्वाब
अंधेरों में खुली आँखें
और रास्तों पर चलते
बेख्याल कदम ..,
कुछ ऐसी ख़ामोशी
जिन्हें जुबा देना
हो जाता है मुश्किल ...
ख्वाहिशों की न खत्म होने वाली
फेरहिस्त ...
जो रोज़ बढ़ती जाती है
जैसे रौशनी की
बदलती दूरी में
परछाई ..///

तीनों के बीच

मैं, मोह, और मृत्यु
तीनों के बीच
जीता हूँ......

आत्म, जग, पर
तीनों के बीच
मलता हूँ आँखें...

युद्ध, शांति, और संशय
तीनों के बीच
पाता हूँ खुद को ...

निवास, निर्वासन और निर्वाण
तीनों के बीच
खोजता हूँ पहचान

रोटी, कपड़ा और मकान
तीनों के बीच
कोशिश हूँ करता
उन तमाम तीनों का
मतलब समझने का....
जहाँ तीन मकारों के परे भी
दुनिया पल रही है
बढ रही है /////

सोमवार, 15 जुलाई 2013

भुक्का

मुझे बेतकल्लुफी से कहना न आया
जब भी कहा तो शब्दों का खिलवाड़
मात्रों का अगला पिछला करके
बना देता हूँ तेरे को मेरा और
बाइबिल से कुरआन से पुराण
बर्फ को मानचित्र पर लाल रंग
हूँ दे देता, साथ में तीसरी दुनिया को जेनोसाइड
अपराधी बनाकर हेग में कर देता हूँ खड़ा ,

अक्षरों में कुलबुलाहट होती है
मोनोलिसा की मुस्कराहट में
सतह के ऊपर बिलबिलाते रिगियाते
महाद्वीपीय मध्य का अबोध रोदन
जिसमे जीवन की श्रेष्टता की वंचना
दोनों कोरों पर आज तक जमी है ,

कहने में जब भी आया बस कहा
विमर्शों के पर्यावसान के बाज़ार में
जब भी खड़ा होता हूँ तो छूंछे हाँथ
जिससे लौटूं तो मेरे हाँथ खोखले
आदर्शों से भरे हो और मेरी आखों पर
यथार्थ का रंगीन चश्मा टंगा रहे
जिससे मैं अगली बार तुमसे मिलूं
तो तुम्हारे खोखले आदर्शों से आँखे मिला सकूँ
और तुम्हारे यथार्थ रंगीन हांथों को चूम सकूँ ///
(जिससे तुम सबको अपना
बनाने का भ्रम पाल सकूँ _) ... वित्रि

गौरैया

आज बहुत दिनों बाद देखी
मुंडेर पर बैठी गौरैया
शायाद एक अरसे बाद
बेगाने कसबे में तो बस पढ़ा था
उजड़ने के बाद मुश्किल होता है बसना
वहीँ सुना था कि उसको निर्वासित
घोषित कर दिया गया है ....
जिसकी आत्मा में स्वार्थ निहित होकर
सुन्दर की निर्मम हत्या करके उसे
कल्पना के रूप में रोज़ परोसा जाता
हाय! उस सुन्दर छलना के दर्शन फिर हुए /

बेखबर

मेरी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे सुबह की ऒस बैठ जाती है 
पत्तों के कोरों पर,

उसकी चाहतें बिलकुल वैसी है 
जैसे हवा में उड़ता परिंदा 
जो उड़ जाना चाहता है उस पार,

हम दोनों की चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवाओं में तैरने के बाद ऒस
मिल जाती है असीम गहराइयों में
और परिंदा थक जाने के बाद
आ जाता है ज़मी पर
सुकून की चादर ओढने की तैयारी में,

इसी मेरी-तुम्हारी-हम दोनों
के बीच होते हुए भी
इन चाहतों के दरम्या
मैं बन जाता हूँ तुम्हारा, और
तुम मेरी निपट अपनी.....///// 

पहेली

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ बात मुझे कह लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो

तुम यादों में रह जाते हो
जैसे हरी दूब के किनके
दांतों में फंस जाते है ...
रफ्ता-रफ्ता खिसक-खिसक के
वो थोड़ा सा जो सताते है,

गहन क्षणों में भी तुम
दबे पाँव चले आते हो
कहते हो कि अब जाते है
पर रात तलक तुम यूँ ही क्यों
ओंठों पर मेरे मुस्काते हो

तुम अपने से लगते हो
जैसे यादें हो जाती है
बढ़ते चलते इस रस्ते पे
तुम साथ मेरे चलो साथी

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ बात मुझे कह लेने दो...////