सोमवार, 30 जुलाई 2012

कविता :- साम्य शब्द


सत्ता और सत्तावादी
विकास और वायदे
ये दो साम्य शब्द है
जो न दिखते है, और
न नज़र आते है
वैज्ञानिक भाषा में
ये वर्चुअल है/
सत्ता, विकास के साथ कायम है  
तो सत्तावादी, वायदों के साथ
और  इनके मध्य पिसते हैं
जन और नागरिक होने के
दुरूह प्रश्न ........
जो हमारी संसद को मानती है
राष्ट्र का स्तम्भ  /
जहाँ विकास के रूप में
फसाएं जाते है चुनावी पेंच
और कह दिया जाता है कि,
भारत विभिन्नताओं का देश है
जहाँ दो कदम पे भाषा
तो चार कदम पे इंसान
जाते है बदल ..../
परन्तु सत्तावादियों ने इसे
जोड़ दिया विकास से,
जिससे आज दो कदम पे
भाषाई राज्य
तो चार कदम पे पैदा हो जाते है
जातीय समीकरण ////
जिसके साथ नापी जाती है
सत्ता और वायदों की मजबूती            
यू. एन . में देखना शुरू  हो जाता है
देश को स्थाई रूप में,पर
सत्तावादियों ने विकास को
देखा है नए चश्मे से
जो तेलंगाना , माओवाद,
आफ्सा, दार्जिलिंग
बोफ़ोर्स से स्पेक्ट्रम के घोटाले
या भोपाल से गोधरा की परिधि
में आता है नज़र साफ़-साफ़
6 बाई 6 की आई साईट पे,
जिसमे संसद व नरीमन पॉइंट
दिखता है आत्मरक्षा की मिसाल के रूप में //,
सत्ता यहाँ उदर में भूख की आग, तो 
विकास में सुरक्षा लेकर चलती है, पर
सत्तावादियों को न ही दिखाई पड़ता है
किसानो के चर्चराए खेत  और
न ही  कालाहांडी, आंध्र  ,
महाराष्ट्र के प्यासे किसानो की फसी हुई हुंडी ///
हाल यह भी सुना है कि संविधान
जो हमारे देश में स्थापित
करता है सत्ता ,
सुनाता है उद्घोषणा कि
सत्तावादियों के हितों को
नहीं किया जा सकता संक्षिप्त
किसी भी स्थिति में....क्योंकि
सत्ता और सत्तावादी
विकास और वायदे
ये दो साम्य शब्द हैं ///////                 

शुक्रवार, 29 जून 2012

निकाय चुनाव 2012

शहर में लोगो की भीड़ है यारो
और ग़ालिब भी कहते है
सलीके के लोग है यारो
कोई हसिया दिखता है
कोई कमल दिखता है
एक महाशय से मिला तो
कोई दिल दिखता है
कोई दरबा दिखता है
चौक से गुज़रा तो
कोई दस दिखता है
कोई सौ दिखता है 
आज ही खबरनवीसो से जाना
नशेमंदी न होगी अब ,पर
कोई वोदका दिखता है
कोई विस्की दिखता है
कल चाय पर कुछ पंडितो से जाना
हमारा शहर भी हाई-टेक हो जायेगा पर ,
कोई दाहिना दिखता है
कोई बांया दिखता है..
अब तो यह सूरत-ए-हाल निकला कि
बाटेंगे तुम्हे अब, पर
कोई हिन्दू दिखता है
कोई मुस्लिम दिखता है
शहर में लोगो की भीड़ है यारो
और ग़ालिब भी कहते है
सलीके के लोग है यारो

बुधवार, 13 जून 2012

हरा + लाल = काला



भिन-भिन-भिन-भिन 
भिन-भिन-भिन-भिन........
इक संगीत ////
गूंज रहा था अचेतन में 
इक अजीब सी दुर्गन्ध 
रही थी फ़ैल 
दूर से दिख पड़ा कुछ
लाल और काले कपडे का चिथड़ा 
सुबह भी पहला रंग 
यही देखा था मैंने, पर 
उसे सुबह देखा था अकेले 
और अभी देख  रहा हू 
कईयों के बीच में 
बाढ़ में घर था डूबा 
तो लाल टिके के चक्कर में 
आया था गुलाबी शहर
जीना सीख ही रहा था 
रोज़ तिपहियो के चक्कों 
सा घिस कर 
कमाता भी ठीक था, पर 
इतना घिसता था कि
उस चिथड़े कि तरह
हरा बचाता लाल बचाता 
और बनता लाल को 
हरा और हरे को .........
और इसी हरे-लाल
मिलावट के दौर में 
काली थी ली पी, और 
कै पे कै भी हुई
उडी भी दुर्गंधिया 
फिर भी लाल-हरा का अंतर 
पहचान न पाया, शायद 
उसको रंगों कि जात 
थी नहीं सुझाती 
इसीलिए तो आज कुछ 
खाकी वर्दी और पंचनामे का कागज 
साथ में बहुत सारी दुर्गंधिया    
और भिन-भिन-भिन.....
भिन-भिन-भिन.......
का संगीत////
जो कह रहे थे कि कल
रात थी पी ली 
शराब ज़हरीली 
जो उसके हरे-लाल को 
मिला दिया और
बना दिया एक रंग 
काला ..............
,,,,,,,,,,,,,,,,,पक्का ///////

निर्णय


इस ग्रह की थी 
कुछ मर्यादाएं 
कुछ जीवित थी 
कुछ सड़ी-गली
कुछ स्वयं चली 
कुछ लादी गई 
इनका वहन
मुझे भी करना, पर
आगे निर्णय मेरा होगा 
किसे है लेकर चलना 
किसे दफन कर देना है
जिससे मेरी संतति को 
मेरा कुछ उपभोग मिले ///// 

मंगलवार, 29 मई 2012

माँ की डेहरी की याद

कभी घर की डेहरियों से
बुलाती माँ की याद
जब वो बाबू जी का
करती इंतज़ार रात भर /
और याद नज़र आती
सुबह की वो भरी-भरी
लाल आँखें , किसकी
सोचो.......
सोचो.......
याद आया ? अरे हाँ !
वो तो माँ होती थी /
आज भी दिमागों के
छल्लो में घूम रहा
वो हथपंखी , जो
माँ रात भर घुमती
और मैं बेखबर सोता ;
हर उस खबर से जो , माँ
को बहुत दूर सुनाई पड़ रही थी
जो मैं आज भी
नहीं सुन पा रहा
शायद ये वही फर्क है
जो माँ बचपन में
कभी गुस्से में , तो कभी
प्यार में ,
जताती थी ///  

तरन्नुम चार

१-; शोख हवाओं के परिंदों से
      कुछ कहना हम भूल गए
      वादी के इस नए मौसम से
      हम उड़ना 
भी आज भूल गए ///
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२-; अक्स तेरा आज भी जिंदा है कहीं
     फिर भी नामो- निशा तेरा 
दिखता नहीं कहीं 
     रोज़-रोज़ चलता हूँ तेरे रूखे साथ में 
     फिर भी तेरी पैमाइश होती नहीं कहीं ..////
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३-; लोग फिर से मुकम्मल जहाँ ढूंढ़ते है
      परिंदे फिर से नए मौसम का आशियाना
ढूंढ़ते है
      पर क्यूँ हम ज़िन्दगी के नए रास्तों पर
      फिर वही पुराना करवा ढूंढ़ते है ..///
*******************************

४-; हम जिस्म के दागों की दावा करते रहे
     फिर भी नए दाग लगते रहे
     ज़िन्दगी इसी कशमोकश में रही
     मौत से भी इसकी दावा न बनी
     लोग फिर कब्र पर भी आते रहे
     अब तो मिट्टी, मिट्टी से लड़ने लगी
     दरख्तों पर भी आज दाग लगने लगे 
     ज़िन्दगी गुज़र हरने में थी लगी
     कब्र की तहों से भी 
हारने लगे ////

राही

पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की
सोच समुन्दर सा गहरा था
कर्म की रेख नापती इसको
लगता कितनी दूर चलू मैं
सोच की गहरे ढूंढ़ चलू मैं
उस कर्म रेख की गहरी स्याही
अपने जीवन पर छोड़  चलू मैं /
पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की ....