रविवार, 19 जुलाई 2015

कविता शीर्षक :- एकांत

एकांत 
कितना सुन्दर होता है
खुद के पास होने के लिए 
या ज़ेहन में बसी दुनिया के
कभी सोचता हूँ कि ऐसा क्यों होता
कि मैं संतुष्ट नहीं रहता
अपनी किसी भी परिस्थिति में
कभी कुछ न करने
कभी बहुत कुछ कर लेने के बाद
इस असंतोष को पालता हूँ
कभी घनघोर ऊँचाइयों के सामने
खुद को पाता हूँ चींटी सा
तो बन जाना चाहता हूँ अगले ही पल
विश्व-विराट।
एकांत
कितना भयावह होता है
निर्वासन की उन्मुक्त सहमति
जीवन के भोग की अगली अवस्था
अंत में खोह की पातालीय कंदराओं
से आती प्रतिध्वनियाँ........
जिसके भ्रम में
लगातार धँसता जाता हैं एकांत
जिसमें अचेतन क्रियाशील है
चेतन को नश्वर बना देने के लिए
जिससे वह पी सके
समुद्रमंथन का देवद्रव्य।
एकांत
अपरिभाषित आदिम शब्द है ।


यात्रा के अंतिम पड़ाव पर
लिखा अंतिम शब्द
किन्हीं पहचाने से रास्तों पर
वापसी का पहला इशारा होता है।
बढ़ते हुए कदम 
अप्रत्याशित लालसा से परिपूर्ण इच्छाएं
होती हैं नेति।
क्योंकि इसके पूर्व सद्
निर्धारित रूप में संघर्ष है करता
पा लेने के लिए वे तमाम
अज्ञात सहजीवी ज्ञान
जिसमें वह बच सके
मात्र वस्तु होने से ,
जिसके वृत्त में वो
दौड़ता है लगातार
केंद्र की ओर , जैसे
किसी कटी पतंग के पीछे
दौडते है दो पाँव
जबकि कई दुर्दिन हाथों से
दी जाती है फाड़ ,
और आखिर में बच जाते हैं तो
दो हाथ और दो पाँव।
बहुत-सी अजीब सी बातें
ज़िन्दगी को थोड़ा ज़्यादा करती हैं
पेड़ अपनी छाया को 
महसूसता है अपने बीज होने में 
नदी अपने प्रवाह को
पाती है समुन्द्र होने में
ईश्वर अपने दैवत्व को
मंडित करता है अनुचर होने में।
कुछ होने से पहले
कुछ होना पड़ता है
पल-प्रति-पल अपनी तथ्यात्मकता
चेतना की वर्तुल दिक्-कालिकता में
स्व को लगातार पाने
और झुठलाने के क्रम में
मृत्यु के निकट
खड़े होना अनुत्तरित
अभिशप्त जीवन की सार्थकता
प्रस्तुत होना है उसके लिए
जिसके समक्ष होकर
होना साकार होता है
क्योंकि अजीब सी बातें
हमेशा अजीब होती नहीं।


आधी रात बालकनी में खड़े होकर
गली के नुक्कड़ पर मेरी परछाई
मुहल्ले के लोगों का करती रही इंतज़ार
लेकिन नींद को घेर रखा था
उसी चौराहे पर खड़े जानवरों ने 
जो उसकी अजनबी आकृति से
या तो थे आक्रांत या कर रहे थे
नींद भी वहीँ खड़ी थी कांपते पैरों से
उसने जैसे तय कर लिया हो
कि फिर नहीं लौटेगी कभी बालकनी में
जबकि यह तय था कि
होगा उसका शिकार अब
किसी आदमखोर से नहीं
बल्कि किनारे की बजबजाती नाली के ऊपर
सैकड़ों सूक्ष्म रक्त-पिपासु हथियारों से,
देखती रही बार-बार गली के भीतर
पडोसी के रोशनदान से आती रौशनी
गली के पहरेदार आतुर थे
अपने विरोध में खड़े अपने विपक्ष के,
फिर भी नींद को इंतज़ार था परछाई का
जिसके चेहरे में कुछ भी नहीं था स्पष्ट
बस एक काला-सा धब्बा-सा !!!
कहाँ हैं वह आँखें जो मेरी थीं !!!
अब नींद ज़्यादा भयभीत थी
आस-पास तैरती परछाइयाँ
उनकी आँखें ज़्यादा अजनबी थीं ,
नींद ने फिर से बालकनी में देखा
परछाई अब भी वहीँ खड़ी थी
नींद ने फिर से देखा पडोसी का रोशनदान
उसके शीशे में नज़र आ रही थी परछाई
औ आखिर में नींद ने कूच कर दिया
परछाई खड़ी रही इंतज़ार में।
नीलामी का इस्तहार 
नाम उत्कृष्ट बहुकोशकीय
पता जैविक नगर 
बकाया राशि-
मातृ ऋण 
पितृ ऋण
गुरु ऋण
समाज ऋण
जाति ऋण
वर्ग ऋण.... आदि-आदि
तर्कशील होकर जन्म लेना
कर्जदार होना होता है।
मैं देर तक जागता रहा
मैं देर तक बचता रहा
मैं होकर भी मैं न रहा
तुम ही कहो मैं क्या रहा
क्षण में उस सा रहा
क्षण में खुद सा रहा
मैं देर तक लड़ता रहा
मैं देर तक हँसता रहा
तुम ही कहो मैं क्या रहा
दृग में बसी उन स्मृतियों में
श्लोक मैं बनता रहा
उस सुनहले रेशों में नग सा जड़ता रहा
मैं देर तक पत्थर रहा
मैं देर तक वन्दित रहा
तुम ही कहो मैं क्या रहा
अवर्णित रंगों सा आकाश फैला
मैं जलता रहा- बुझता रहा
इस देह से उठती रही मन की क्षुधा
यह देखकर सारा जगत विस्मृत रहा
मैं देर तक इस वृन्त पर पकता रहा
मैं देर तक तुम सा रहा- तुम ही रहा
तुम ही कहो मैं क्या रहा /


कई बार नकार के बीच खड़े होकर
सहमत होना , असहमतियों को ओढ़ना
और जीना बनायीं लीक पर
होता है बिलकुल आसान ;
असल में दुनिया की परिभाषाएं 
जमीन की तरह गोल समझी जाती हैं
मनुष्य को श्रेष्ठ घोषित करना
उसी ढर्रे में माना जा सकता है
जिसमें मुस्कुराते हुए विचारों को
उसकी क्रमिता में दिखाया जाये,
गौर करने पर मनुष्य मात्र
असहमतियों के दौर में
सहमत होने का दस्तावेज़ है।