शुक्रवार, 2 मई 2014

कोठरी

अब भी जाता हूँ अधकच्चे रास्तों से 
उस अँधेरी सीलन भरी कोठरी में 
जो मेरे पुश्तैनी कोठी के ठीक दांये थी 
जिसे अब मेरे चाचा-बाबा ने छोड़ दिया 
कह कर ये , कि अब इसकी दीवारें चरचरा गयीं हैं
और छत भी लचक गई है
अब उसके आँगन के बीच तुलसी 
बस ठूंठ भर रह गई है 
और किनारे का बम्बा वैसे ही खड़ा
बिना हत्थे के जंग लगा
जिसके नीचे पुरखों के मर्तबान
रखने से एक अर्ध चन्द्र बन गया है ,
और लकड़ी के दरवाजे जिनके नीचे का सिरा
झड़ गया है , लटके हैं उन्ही कुंडो के सहारे
जिन्हें मैं बचपन में अपनी ऐड़ी उचकाकर भी
नहीं पता था खोल ,
जिनसे होकर मैं अपनी दुपहर में
छत्ती पर रखी सन्दूकचियों को
खंगालता, और उन तमाम पन्नों को
जिनमें दफ़न थे पुरखों के किस्से
जिनमें से कुछ मैंने सुन रखे थे
पहले भी माँ से ,
उसी सीलन भरी कोठरी में
दिवार में गड़ी लकड़ी की खूटी
जिस पर लटका रहता एक लम्बा कुर्ता
साथ ही एक सुफेद अनौछा
और उसमें पड़ी मसहरी
जिसके सिरहाने पर पड़ी थीं
दो पैरों के बीच खेलती यादें
जिसमें कोई एक बारगी ऊपर उठाता
फिर नीचे.........
दरअसल अब तक पड़ी थी कुंडली
जिसे अबकी कर दिया गया प्रवाहित
कारण मात्र इतना दिया कि
लोगों के मर जाने के बाद
उनकी चीज़ों को रखना अशुभ होता है /

सोमवार, 13 जनवरी 2014

समय-पाठ व प्रेम

चारो तरफ के नगाड़ों के शोर में 
वो कहते हैं कि 
अपनी आदत बदलो 
क्योंकि सियासत बदल गई है, 
बदलते सन्दर्भों में बदल डालो 
शब्दों के अर्थ 
गढ़ के नए शब्द 
जिससे कविता का अर्थ वही हो 
जो इस शोर में सुनाई न पड़े 
तुम मात्र शोर के सर्जक हो 
किसी भाव या विचार के बिंदु नहीं 
चारो तरफ के जलते ताप में 
वो कहते है कि 
अपने मुखौटे बदलो 
क्योंकि पहचान के मानदंड 
बदल गए हैं
भीतरघाघ समय में 
नयी परिभाषा गढ़ो  
जिससे सम्बन्धों से नहीं 
आँखों के कोटरों से  
नाक-कान की बनावट से 
ओठों की मोटाई 
यहाँ तक कि रंग से फर्क हो सके 
तुम मात्र मनुष्य नहीं हो 
तुम अगली पीढ़ी के वर्गीकृत जीव हो 
तुम मुखौटे हो 

इस शोर और ताप के मध्य 

मैं कहता हूँ कि 
ऐसे शब्द गढ़ो जिनका अर्थ हो 
प्रेम....
ऐसे मुखौटे बदलो 
जिससे सब तो नहीं गर 
कुछ तो कर सकें तुमसे 
प्रेम....
हाँ मैं न सर्जक हूँ 
और न कविता होती है 
इन सबके बीच यदि 
कोई भाव या विचार बिंदु है तो वो है 
प्रेम ....  
क्योंकि बदलते समय में 
बृहत्तर मनुष्यत्व का उर्वर विस्तार है 
प्रेम .../ 

ढिबरी

एक डिबिया 
और एक बाती
इसी के सहारे खोजते हैं 
दुनिया के छिपे हुए 
बचे हुए 
आदिम अवशेष 
जिसकी ललछौंक रोशनी में 
वो रचते हैं पिछली सदी की 
षड्यंत्रकारी पद्धतियों का 
निगमनात्मक शास्त्र
जिसमें सदियों का काजल 
होता रहता है इकठ्ठा 
परत दर परत 
और समय के विदुर उन्हें 
शमित कर देना चाहते हैं 
पवित्र जल की धार हाँथो में लेकर 
जिससे वो इतिहास की वर्तुल गति में 
चन्द्र को राहु के ग्रास तक पंहुचा सके 
और उन तमाम लोगों के 
पल्लवित होने की पहली शर्त का 
कर सके मानकीकरण,
मनुष्य होने के 
परिकल्पनात्मक सबूतों के मध्य 
इंसान एक छिपा हुआ सियार है 
जो घात लगाकर 
अपना क्षेत्र निर्धारित करता है 
जिसमें दूसरे अस्तित्व का प्रवेश निषेध है 
अन्यथा मात्र एक अनुबंध  
जीवन के समस्त अधिकार 
महापात्र को अर्पित /

शनिवार, 4 जनवरी 2014

पुनरीक्षण

जब भी निकलता हूँ 
अँधेरी गलियों में 
जहाँ होते हैं रात में 
बहुत से जानवर 
जो कुतर रहे होते हैं 
वे तमाम चीज़ें
जिन्हें हमने फेंक दिया 
समझ के कचरा 
जिनमें खोजते हैं वे 
ज़िन्दगी की आदिम-शक्ति 
और हमें नहीं सुनायी पड़ती 
उनकी खटर-पटर या 
उनकी चीख-पुकार 
सुनना चाहता हूँ आज 
उन सब आवाजों को 
उन सारी उठा-पटक को 
ज़िन्दगी की उन तमाम 
चीज़ों को रखना चाहता हूँ 
सलीके से, 
जिन्हें रख आये थे हम
उन खोह सी अँधेरी गलियों में 
जिन पर समय एक विषैली ग्रंथि वाला 
जीव है //

रविवार, 1 दिसंबर 2013

झाड़ न दो

रेत को मुट्ठी में पकड़ के देखा
तो भुरभुरा के खिसक जाती है
रह जाते है तो कुछ कण
जो चिपके रहते है अंतस में
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उन्हें झाड़ न दो ,

मिट्टी को हवा में उड़ते देखा
तो रौशनी के साथ ओझल हो जाती है
रह जाती है तो एक परत
जो बैठी रहती है रोशनदान की जालियों पर
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उन्हें झाड़ न दो,

बारिश की बूंदों को गिरते देखा
तो आंगन में फ़ैल जाती हैं
अपनी पूरी निर्मलता की शिद्दत से
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उन्हें झाड़ न दो,

इंसान को जब पनपते देखा
तो फैला देता हैं हर सम्भावित दिशाओं में
सूक्ष्म बुनावट वाला जाल
जिसमे नज़र आती हैं उसकी पहचान
किसी जालीनुमा मछली के गलफड़ों सी
जिससे वो कहला सके खुद को मोती मछली
शायद बिना कुछ सोचे
जब तक तुम उसे झाड़ न दो
और निकाल न लो उसके गलफड़े में फंसा
वो मोती ,
जिससे वो सिद्ध करना चाहता है
कि वो सीपी हैं /


   

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

दीमक

इस अंधियारे में चुप्पी से
चाट रहे है कई दीमक
मेरे स्वप्न-घर के किवाड़ 
और तुम खड़े हो सामने मेरे
खोखल में पड़े लिजलिजे
दसियों दांतो वाले मासूम कीड़े से
जो निरंतर मद्धम मेहनतकश है
मेरी आँखों की चमक को
धुंधला करने के लिए,
जिससे मेरा लाख का महल
पाये न जलने अपितु
गिर जाये भुरभुराकर और
हज़ारों छिद्रों से घुंस सके
सिहरती सर्द हवाएं
जमा देने के लिए लाल ग्लेशियर
कभी देखा है उसे
जो चीरता रहता है निपट एकांत को भी
इस अंधियारे में
प्रकट होते है बहुत से चेहरे, दृश्य-चित्र
मेमने के पीछे भागता भेड़िया
भेड़िये के पीछे भागता नरभक्षी
नरभक्षी के पीछे भागता नर
नर के पीछे भागता नर
और अंत में एक अदृश्य तट
जिसपर कुछ निरंतर भ्रम है बना 
मानो कहीं भीतर ही भीतर
मिल रही हो चेतावनी
किर्र- किर्र- किर्र -किर्र.......////

सोमवार, 18 नवंबर 2013

रेखाएं बदलती हैं

रेखाएं बदलती हैं
मुझे नहीं लगता
वरना खादी पहनने वाले
किसी फ़िल्म के अभिनेता न बन जाते ?
खैर नेता न बन पाने से
कोई जनता भी नहीं बन जाता
बस कल ही कचहरी वाला तोता
निकाल बैठा
मेरा बेटा ज़मींदार होगा
मैंने कहा ज़मींदारी कैसे मिलेगी ?
तो फटाक से निकाल दी खानदानी पर्ची
जिसमे लिखा था गड़े खजाने का रहस्य
सतपुड़ा के जंगल !!
अरे! मेरा बेटा जंगली होगा ?
रेखाएं कैसे बदलती है !
छुटपन में हस्तशास्त्र  में पढ़ा था
शनि राहु पाहुन बन के आयेंगे
और स्त्रियों को शगुन में ले जायेंगे 
तब ही मैं सोचता हूँ कि अब चाँद
दिखता क्यों नहीं या बड़े शहरों में
चार इंच की दिवार बहुत ऊँची हो गई है ,
अब बचा ही क्या जो मैं जानता
कि रेखाएं बदलती है
क्योंकि रुपया हाँथ का मैल होता है
हद्द हो गई अब कहाँ है कोई शुद्ध 
सब तो ज्यादा से ज्यादा 
उठाना चाहते है मैला, कामना चाहते है
बचाना चाहते है, उड़ाना चाहते है
आज कल तो गुप्तचरों ने रात के अँधेरे में
कईयों को सोते देखा है मैले पर
अरे अब तो सोना भी मुहाल है
पता नहीं कब मैले वाले की
बड़की चारपहिया कचक जाये
और हमें भेज दे ब्लैकबक योनि में
पता नहीं धोती वाले ने क्या सोचा था
कि घर को मैला मुक्त बनाएंगे !
रेखाएं बदलती है
मुझे नहीं पता
कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार
और सुबह होने न दे
ढाई आखर का प्रेम डेढ़ ही रहने दो
क्योंकि ज़िन्दगी के साथ का तो क्या 
बाद में सेकंड इनिंग होम का ही सहारा है
अरे सहारा से भी रेखाएं बदलती हैं
साईकिल चलाते-चलाते देखो जहाज़ चलाने लग जाता है
वैसे अब रेखाएं बदलती है
मुझे नहीं पता
वरना दो अर्थों के भय से मुझे क्या
मुझे तो द्विअर्थी में ही मज़ा आता है
कहीं सुना था कि
जो मज़ा खाज में है वो मज़ा राग में कहाँ  ///