बुधवार, 28 अगस्त 2013
सोमवार, 15 जुलाई 2013
भुक्का
मुझे बेतकल्लुफी से कहना न आया
जब भी कहा तो शब्दों का खिलवाड़
मात्रों का अगला पिछला करके
बना देता हूँ तेरे को मेरा और
बाइबिल से कुरआन से पुराण
बर्फ को मानचित्र पर लाल रंग
हूँ दे देता, साथ में तीसरी दुनिया को जेनोसाइड
अपराधी बनाकर हेग में कर देता हूँ खड़ा ,
अक्षरों में कुलबुलाहट होती है
मोनोलिसा की मुस्कराहट में
सतह के ऊपर बिलबिलाते रिगियाते
महाद्वीपीय मध्य का अबोध रोदन
जिसमे जीवन की श्रेष्टता की वंचना
दोनों कोरों पर आज तक जमी है ,
कहने में जब भी आया बस कहा
विमर्शों के पर्यावसान के बाज़ार में
जब भी खड़ा होता हूँ तो छूंछे हाँथ
जिससे लौटूं तो मेरे हाँथ खोखले
आदर्शों से भरे हो और मेरी आखों पर
यथार्थ का रंगीन चश्मा टंगा रहे
जिससे मैं अगली बार तुमसे मिलूं
तो तुम्हारे खोखले आदर्शों से आँखे मिला सकूँ
और तुम्हारे यथार्थ रंगीन हांथों को चूम सकूँ ///
(जिससे तुम सबको अपना
बनाने का भ्रम पाल सकूँ _) ... वित्रि
जब भी कहा तो शब्दों का खिलवाड़
मात्रों का अगला पिछला करके
बना देता हूँ तेरे को मेरा और
बाइबिल से कुरआन से पुराण
बर्फ को मानचित्र पर लाल रंग
हूँ दे देता, साथ में तीसरी दुनिया को जेनोसाइड
अपराधी बनाकर हेग में कर देता हूँ खड़ा ,
अक्षरों में कुलबुलाहट होती है
मोनोलिसा की मुस्कराहट में
सतह के ऊपर बिलबिलाते रिगियाते
महाद्वीपीय मध्य का अबोध रोदन
जिसमे जीवन की श्रेष्टता की वंचना
दोनों कोरों पर आज तक जमी है ,
कहने में जब भी आया बस कहा
विमर्शों के पर्यावसान के बाज़ार में
जब भी खड़ा होता हूँ तो छूंछे हाँथ
जिससे लौटूं तो मेरे हाँथ खोखले
आदर्शों से भरे हो और मेरी आखों पर
यथार्थ का रंगीन चश्मा टंगा रहे
जिससे मैं अगली बार तुमसे मिलूं
तो तुम्हारे खोखले आदर्शों से आँखे मिला सकूँ
और तुम्हारे यथार्थ रंगीन हांथों को चूम सकूँ ///
(जिससे तुम सबको अपना
बनाने का भ्रम पाल सकूँ _) ... वित्रि
गौरैया
आज बहुत दिनों बाद देखी
मुंडेर पर बैठी गौरैया
शायाद एक अरसे बाद
बेगाने कसबे में तो बस पढ़ा था
उजड़ने के बाद मुश्किल होता है बसना
वहीँ सुना था कि उसको निर्वासित
घोषित कर दिया गया है ....
जिसकी आत्मा में स्वार्थ निहित होकर
सुन्दर की निर्मम हत्या करके उसे
कल्पना के रूप में रोज़ परोसा जाता
हाय! उस सुन्दर छलना के दर्शन फिर हुए /
मुंडेर पर बैठी गौरैया
शायाद एक अरसे बाद
बेगाने कसबे में तो बस पढ़ा था
उजड़ने के बाद मुश्किल होता है बसना
वहीँ सुना था कि उसको निर्वासित
घोषित कर दिया गया है ....
जिसकी आत्मा में स्वार्थ निहित होकर
सुन्दर की निर्मम हत्या करके उसे
कल्पना के रूप में रोज़ परोसा जाता
हाय! उस सुन्दर छलना के दर्शन फिर हुए /
बेखबर
मेरी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे सुबह की ऒस बैठ जाती है
पत्तों के कोरों पर,
उसकी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवा में उड़ता परिंदा
जो उड़ जाना चाहता है उस पार,
हम दोनों की चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवाओं में तैरने के बाद ऒस
मिल जाती है असीम गहराइयों में
और परिंदा थक जाने के बाद
आ जाता है ज़मी पर
सुकून की चादर ओढने की तैयारी में,
इसी मेरी-तुम्हारी-हम दोनों
के बीच होते हुए भी
इन चाहतों के दरम्या
मैं बन जाता हूँ तुम्हारा, और
तुम मेरी निपट अपनी...../////
जैसे सुबह की ऒस बैठ जाती है
पत्तों के कोरों पर,
उसकी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवा में उड़ता परिंदा
जो उड़ जाना चाहता है उस पार,
हम दोनों की चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवाओं में तैरने के बाद ऒस
मिल जाती है असीम गहराइयों में
और परिंदा थक जाने के बाद
आ जाता है ज़मी पर
सुकून की चादर ओढने की तैयारी में,
इसी मेरी-तुम्हारी-हम दोनों
के बीच होते हुए भी
इन चाहतों के दरम्या
मैं बन जाता हूँ तुम्हारा, और
तुम मेरी निपट अपनी...../////
पहेली
कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ बात मुझे कह लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम यादों में रह जाते हो
जैसे हरी दूब के किनके
दांतों में फंस जाते है ...
रफ्ता-रफ्ता खिसक-खिसक के
वो थोड़ा सा जो सताते है,
गहन क्षणों में भी तुम
दबे पाँव चले आते हो
कहते हो कि अब जाते है
पर रात तलक तुम यूँ ही क्यों
ओंठों पर मेरे मुस्काते हो
तुम अपने से लगते हो
जैसे यादें हो जाती है
बढ़ते चलते इस रस्ते पे
तुम साथ मेरे चलो साथी
कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ बात मुझे कह लेने दो...////
कुछ बात मुझे कह लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम यादों में रह जाते हो
जैसे हरी दूब के किनके
दांतों में फंस जाते है ...
रफ्ता-रफ्ता खिसक-खिसक के
वो थोड़ा सा जो सताते है,
गहन क्षणों में भी तुम
दबे पाँव चले आते हो
कहते हो कि अब जाते है
पर रात तलक तुम यूँ ही क्यों
ओंठों पर मेरे मुस्काते हो
तुम अपने से लगते हो
जैसे यादें हो जाती है
बढ़ते चलते इस रस्ते पे
तुम साथ मेरे चलो साथी
कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ बात मुझे कह लेने दो...////
शुक्रवार, 15 मार्च 2013
"चुप्पी"
तुम्हारी चुप्पी में मौन नहीं
बस सरसराहट है सर्पतों की
झाड़ियों की, रिसते हुए श्रोते की
जिसमे भावों का भंवर जाल है
और कयास लगाने के लिए
मेरे सागर का दरियाई घोड़ा///
मैं शब्दबद्ध चाहता हूँ करना
तुम्हारे दो ध्वनियों के बीच की चुप्पी
जहाँ पर तुम सांस लेते हो
ठहर जाते हो तंत्रिकाओं को जोर देने के लिए
दौड़ाना चाहता हूँ तुम्हारी चुप्पी का इतिहास
जो स्थिर होकर पुंसवादियों को
देती है मौका तुम्हारी ध्वनियों को
चुप्पी के बीच हज़म करने को ////
मेरे आस-पास संसार है चुप्पियों का
और मौन निमंत्रण की बहुत सी पत्री
जिसमे तुम्हारे उर्वर-भावों पर
निर्मम खुरों और हल-बारी से
मनमानी क्षुधा के खेत बोने-काटने का
और फिर तुम्हारी नसों में
मिला के परम्पराओं का रसायन
तुम्हारी ध्वनियों को चुप्पी में
बदलने का स्वागाताकांक्षी आमंत्रण है///
तुम्हारी चुप्पी का मतलब मैं समझता हूँ
पर ये पितृऋण से दबे हुए
तुम्हे गूंगा बनाने का स्वांग रचते है
इसलिए तुम बन जाओ अटलांटिक कटक
और समझा दो इन्हें अपनी चुप्पी का विस्तार
जिससे मेरे सागर का दरियाई घोड़ा
तुम्हारे धरातल पर आकर देख सके
कि पाताल की असीम गहराइयों को
तुमने कब का नाप लिया है और
धरा के ऊपर तुमने विस्तार लिया है पा///
क्योंकि कहते है
हजारों चुप्पी से मिलकर भी इक आवाज़ बनती है/////
बस सरसराहट है सर्पतों की
झाड़ियों की, रिसते हुए श्रोते की
जिसमे भावों का भंवर जाल है
और कयास लगाने के लिए
मेरे सागर का दरियाई घोड़ा///
मैं शब्दबद्ध चाहता हूँ करना
तुम्हारे दो ध्वनियों के बीच की चुप्पी
जहाँ पर तुम सांस लेते हो
ठहर जाते हो तंत्रिकाओं को जोर देने के लिए
दौड़ाना चाहता हूँ तुम्हारी चुप्पी का इतिहास
जो स्थिर होकर पुंसवादियों को
देती है मौका तुम्हारी ध्वनियों को
चुप्पी के बीच हज़म करने को ////
मेरे आस-पास संसार है चुप्पियों का
और मौन निमंत्रण की बहुत सी पत्री
जिसमे तुम्हारे उर्वर-भावों पर
निर्मम खुरों और हल-बारी से
मनमानी क्षुधा के खेत बोने-काटने का
और फिर तुम्हारी नसों में
मिला के परम्पराओं का रसायन
तुम्हारी ध्वनियों को चुप्पी में
बदलने का स्वागाताकांक्षी आमंत्रण है///
तुम्हारी चुप्पी का मतलब मैं समझता हूँ
पर ये पितृऋण से दबे हुए
तुम्हे गूंगा बनाने का स्वांग रचते है
इसलिए तुम बन जाओ अटलांटिक कटक
और समझा दो इन्हें अपनी चुप्पी का विस्तार
जिससे मेरे सागर का दरियाई घोड़ा
तुम्हारे धरातल पर आकर देख सके
कि पाताल की असीम गहराइयों को
तुमने कब का नाप लिया है और
धरा के ऊपर तुमने विस्तार लिया है पा///
क्योंकि कहते है
हजारों चुप्पी से मिलकर भी इक आवाज़ बनती है/////
सोमवार, 18 फ़रवरी 2013
चीज़ें
कमरे में रखा फूलदान
रोज़ नए-नए फूल लगते
मेरे उठने से पहले वो
अपनी जगह पा चुके होते है
जैसे कहते हो, आज तुम
फिर से देर कर गए /
फैले विस्तृत आकाश में
प्रछन्न मेघ मालाएं
रात्रि में काली स्लेट पर
चांदनी का टुकड़ा
यह सब नियत आ ही जाते है/
दराज में पड़ी किताबें अपनी
जगह पा लेती है और
मेरी कलम में स्याही
मेरे लिखने के लिए हर रोज़/
सब कुछ वैसा ही है जैसे
होते थे तुम साए में/
पर, पिछली बारिश में सब
गया धुल कर बह .........
फूलदान में सूखे फूल
स्लेट पर आमावश
और किताबों के पन्ने अब
खुली खिड़की की खड़खड़ाने से
लगे है फटने, साथ ही
कलम में सूखी स्याही के
पड़ गए है बिम्ब
जिनसे लिखने से कागज़ पर
सिर्फ निशाँ बन जाते है
अब कोई रंग नहीं उभरता //
रोज़ नए-नए फूल लगते
मेरे उठने से पहले वो
अपनी जगह पा चुके होते है
जैसे कहते हो, आज तुम
फिर से देर कर गए /
फैले विस्तृत आकाश में
प्रछन्न मेघ मालाएं
रात्रि में काली स्लेट पर
चांदनी का टुकड़ा
यह सब नियत आ ही जाते है/
दराज में पड़ी किताबें अपनी
जगह पा लेती है और
मेरी कलम में स्याही
मेरे लिखने के लिए हर रोज़/
सब कुछ वैसा ही है जैसे
होते थे तुम साए में/
पर, पिछली बारिश में सब
गया धुल कर बह .........
फूलदान में सूखे फूल
स्लेट पर आमावश
और किताबों के पन्ने अब
खुली खिड़की की खड़खड़ाने से
लगे है फटने, साथ ही
कलम में सूखी स्याही के
पड़ गए है बिम्ब
जिनसे लिखने से कागज़ पर
सिर्फ निशाँ बन जाते है
अब कोई रंग नहीं उभरता //
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