सोमवार, 15 जुलाई 2013

बेखबर

मेरी चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे सुबह की ऒस बैठ जाती है 
पत्तों के कोरों पर,

उसकी चाहतें बिलकुल वैसी है 
जैसे हवा में उड़ता परिंदा 
जो उड़ जाना चाहता है उस पार,

हम दोनों की चाहतें बिलकुल वैसी है
जैसे हवाओं में तैरने के बाद ऒस
मिल जाती है असीम गहराइयों में
और परिंदा थक जाने के बाद
आ जाता है ज़मी पर
सुकून की चादर ओढने की तैयारी में,

इसी मेरी-तुम्हारी-हम दोनों
के बीच होते हुए भी
इन चाहतों के दरम्या
मैं बन जाता हूँ तुम्हारा, और
तुम मेरी निपट अपनी.....///// 

पहेली

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ बात मुझे कह लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो

तुम यादों में रह जाते हो
जैसे हरी दूब के किनके
दांतों में फंस जाते है ...
रफ्ता-रफ्ता खिसक-खिसक के
वो थोड़ा सा जो सताते है,

गहन क्षणों में भी तुम
दबे पाँव चले आते हो
कहते हो कि अब जाते है
पर रात तलक तुम यूँ ही क्यों
ओंठों पर मेरे मुस्काते हो

तुम अपने से लगते हो
जैसे यादें हो जाती है
बढ़ते चलते इस रस्ते पे
तुम साथ मेरे चलो साथी

कुछ गीत मुझे गढ़ लेने दो
कुछ साज़ मुझे बुन लेने दो
तुम साथ चलो मेरे हमदम
कुछ बात मुझे कह लेने दो...////

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

"चुप्पी"

तुम्हारी चुप्पी में मौन नहीं
बस सरसराहट है सर्पतों की
झाड़ियों की, रिसते हुए श्रोते की
जिसमे भावों का भंवर जाल है
और कयास लगाने के लिए
मेरे सागर का दरियाई घोड़ा///

मैं शब्दबद्ध चाहता हूँ करना
तुम्हारे दो ध्वनियों के बीच की चुप्पी
जहाँ पर तुम सांस लेते हो
ठहर जाते हो तंत्रिकाओं को जोर देने के लिए 

दौड़ाना चाहता हूँ तुम्हारी चुप्पी का इतिहास
जो स्थिर होकर पुंसवादियों को
देती है मौका तुम्हारी ध्वनियों को
चुप्पी के बीच हज़म करने को ////

मेरे आस-पास संसार है चुप्पियों का
और मौन निमंत्रण की बहुत सी पत्री
जिसमे तुम्हारे उर्वर-भावों पर
निर्मम खुरों और हल-बारी से
मनमानी क्षुधा के खेत बोने-काटने का
और फिर तुम्हारी नसों में
मिला के परम्पराओं का रसायन
तुम्हारी ध्वनियों को चुप्पी में
बदलने का स्वागाताकांक्षी आमंत्रण है///

तुम्हारी चुप्पी का मतलब मैं समझता हूँ
पर ये पितृऋण से दबे हुए
तुम्हे गूंगा बनाने का स्वांग रचते है
इसलिए तुम बन जाओ अटलांटिक कटक
और समझा दो इन्हें अपनी चुप्पी का विस्तार
जिससे मेरे सागर का दरियाई घोड़ा
तुम्हारे धरातल पर आकर देख सके
कि पाताल की असीम गहराइयों को
तुमने कब का नाप लिया है और
धरा के ऊपर तुमने विस्तार लिया है पा///

क्योंकि कहते है
हजारों चुप्पी से मिलकर भी इक आवाज़ बनती है/////

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

चीज़ें

कमरे में रखा फूलदान
रोज़ नए-नए फूल लगते
मेरे उठने से पहले वो
अपनी जगह पा चुके होते है
जैसे कहते हो, आज तुम
फिर से देर कर गए /

फैले विस्तृत आकाश में
प्रछन्न मेघ मालाएं
रात्रि में काली स्लेट पर
चांदनी का टुकड़ा
यह सब नियत आ ही जाते है/

दराज में पड़ी किताबें अपनी
जगह पा लेती है और
मेरी कलम में स्याही
मेरे लिखने के लिए हर रोज़/

सब कुछ वैसा ही है जैसे
होते थे तुम साए में/
पर, पिछली बारिश में सब
गया धुल कर बह .........

फूलदान में सूखे फूल
स्लेट पर आमावश
और किताबों के पन्ने अब
खुली खिड़की की खड़खड़ाने से
लगे है फटने, साथ ही
कलम में सूखी स्याही के
पड़ गए है बिम्ब
जिनसे लिखने से कागज़ पर
सिर्फ निशाँ बन जाते है
अब कोई रंग नहीं उभरता //

बुधवार, 30 जनवरी 2013

प्री-पोस्ट

भटकती केन्द्रीयता के बीच
विखंडित वर्जनाएं और
लिजलिजेपन की दुर्गंधियाँ
अन्स्थल में भटकती आवाजें
कंदराओं से आती मुक्ति वीणा
सौन्दर्य में भीगी बालाएं
और भिन-भिनाते मुद्रा के खुले मुख
सपाट दूर विद्रोहों से होकर
निकला समुद्र का ज्वार
और अभिशप्त  प्रेतों की आत्मा
यौनिकता के रूढ़ प्रतिमान
जिसमे परोसा अद्धुनातन विचार
क्षणिक सरोकार में परिभाषित
ललायित नए सन्दर्भ गढ़ने  को
पिछले दरवाजे की खड़-खड़ और
आता ध्वजों पर भर के ग्लोब
दबे पाँव सरकते-सरकते आकर
जाता है मिल परछाई में
लुप्त होकर मानो अनुनाद
दिग्भ्रमित केंद्र और परिधि
शंका उठती जिसमे स्थानीयता
केंद्र की उठती भीषण लपटें
चला जा रहा उसी पथ पर
पंथवरों की तरह सर झुकाएं.....
शक्तिपुंज में खड़ा हाँथ जिसमे
व्यक्ति, संशय, अनास्था, मूल्यहीनता,
व्यवस्था विरोध, अतीतविमुखता
बुद्धिवाद में एनलाइटेंमेंट प्रोजेक्ट
देवता है मानव निर्मित
पृष्ट में जो है खड़ा
बिम्ब, प्रतीक, अन्तश्चेतना,
भविष्य और क्षय  से पूरित
रेंगता, निख्ड़ता इसलिए अब स्वायत
गुणसूत्रों में तैरता मृत्युगीत
लेखक, कला, विचार, इतिहास
करते बारी-बारी अपने पिंडदान
मात्र संरक्षित ध्वनि शब्द
आते पल-प्रतिपल निकट और निकट
बढ़ता हुआ हाहाकार स्तब्ध
अनिश्चित , चीज़ों का बाज़ार
दिखती परछाई भी विशाल
और छोटा दिखता प्रेत
ग्लोबल मैन, तीन मकारों की दुनिया
नसों में होता पॉवर शिफ्ट
मर्द वियाग्रा और नारी कंडोम थामे
यूटोपिया से डिसटोपिया (एंटी-यूटोपिया)
ब्लैक लिटरेचर से ब्लैक वीमेन टॉक
 डेथ ऑफ़ मनी से मास कल्चर
आइडियोलॉजी में ग्लोबल मैन
अकड़ रहा है खाकर चमत्कारी मैगी
रेस में सुपर टेक्नोलॉजी
पोस्ट स्मोकटेक सिविलाइज़ेशन
देह और प्रेत को बना प्रोसुमर
देह सिखाता श्रम और
देता सेवा प्रेत को
बनाकर परछाई विराट वीभत्स
सारे रेवोलुशन हैं ख़त्म
मॉडर्न बौद्धिक की बनाई परछाई
देखता रेटिना की नसों को तानकर प्रेत
हो गया लेज़ का चिप्स
खाकर देह जीरो फैट
मल्टी विटामिन-मिनिरल टेबलेट
बंद है विखंडन की शीशी में
जिसमे देह और प्रेत
उड़ सकते है उड़नतश्तरी में
बिना कुंडली जागरण के
क्योंकि भटकती केन्द्रीयता के बीच
विराट वीभत्स परछाई ने
धरती को सेंटर ऑफ़ मास चिन्हित किया है ////
 

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

कोल्ड नाइट

यूँ ही जागा रहा रात भर
बेचैन काली रात पूस में
ठण्ड से भी ठंडी रात
सडको पर सिर्फ दिखते है मटियाले
बनकर मेरे गिरेबान का कॉलर
बचाते मुझे सर्पतों की सुख्हंडों से
करके मुझे अकेला बिलकुल
क्योंकि उन्होंने कर दी घोषणा
अब तुम बहोगे १४४ धारा में
वर्ना पूर्णिमा के दरिन्दे तुम्हारे
गरमा- गर्म गोश्त को निकाल
लेंगे तुम्हारे कॉलर से
चिल्लाना तो बिलकुल भी न 
नहीं तो सेंक लेगे बार के कौड़ा
खड़ी धूप के कोहरे में गाँधी टोपीवाले नागरिक
और रंग बिरंगे प्रचारों के
साथ ही , तुम जाओगे बन 
टी आर पी के वन नाइट स्टार
और घर पर बैठे तिरोहित जन
गर्म चाय-पकोड़ों के साथ
तुम्हारी गंधैली ज़िन्दगी की
बदबू पर , करके इन्द्रिय बंद
जायेंगें बन गाँधी जी के बन्दर
जिनके होने का एहसास होता है
उनके सीने के फूलने पचकने से मात्र ...
पर तुम डरना नहीं क्योंकि
तुम्हारे लोथड़ों और खून
का डी एन ए आयोगों और समितियों
की स्याही में नीला दिखेगा ,और
गणतंत्र में तुम बन जाओगे काले
तुम्हारी स्निग्धता और स्वतंत्र
होने की इच्छा अब भी काली है
क्योंकि तुम्हारे देश का कानून
आज भी चलता है औपनिवेशिक 
दासता के ढर्रे वाली धर्मावली पर
और तुम्हारी भयानक आत्मा को
मिल न सकेगी मुक्ति न्यायाधिकरण में भी
चाहे करो कितने भी पिंड दान .........
जानते हो क्यूँ ....क्योकि मोक्ष के लिए भी
सब ठीक होना जरुरी है
और ठीक होने के लिए
तुम इतना तो ख़याल रखो कि
जब इस गणतंत्र में आँखे खोलो
तो तुम जन्मांध बन जाओ 
बना लो अपने दिल-फेफड़े को साउंड प्रूफ
और कानो में कुछ भी भुरभुराए तो
कान में डाल लो पिघला हुआ सीसा
और चेतन का सी टी स्कैन करके
बना दो रिपोर्ट कि तुम कोमा में हो ......
क्योंकि यूँ ही जागता रहा रात भर ............./////////////////

रविवार, 23 दिसंबर 2012

स्त्री के प्रति

जब मर्द ने आँखे खोली
तब पहला चेहरा देखा माँ का
वो भी एक स्त्री है

जब तक सलामत रहा
तब वो बहन की राखी थी
वो भी एक स्त्री है

जब सौन्दर्य एवं सुकून में जीया
तब वो प्रेमिका थी
वो भी एक स्त्री है

जब लडखडाए कदम ज़िन्दगी में
संवारी ज़िन्दगी पत्नी ने
अपनी पूरी ज़द्दोज़हद से
वो भी एक स्त्री है

जब थके कदमो से कभी
घर की चौखट पे लौटा
तब दरवाजे पर करती इंतज़ार बेटी
थामे गिलास में पानी और गुड
वो भी एक स्त्री है

आँखे खोलने से बंद होने तक
जिसने साथ निभाया
जिसने तुम्हे जंतु से इंसान बनाया
वो भी एक स्त्री है

फिर सवाल एक उठता है कि
जिसे तुमने चौराहे पर छेड़ा
जिसे तुमने चंद कौड़ी के लिए
गैस के चूल्हे में भून दिया
जिससे शराब के नशे में
भद्दी भद्दी गालियाँ दी और
लात-घूंसों से नवाजा
जिसे तुमने जब चाहे तब
बना लिया अपनी हैवानियत भरी
हवस का शिकार
सिर्फ एक मिलीमीटर चमड़ी की खातिर .
वो क्या कोई नहीं है तुम्हारी
जवाब अगर न दे सको तो
निकाल कर फेंक दो उन आँखों को
काट कर अलग कर दो उन हांथो को
कुचलकर शिश्न को बन जाओ नामर्द
और दुआ करो खुद अपने लिए कि
जीने का तुम्हे अब कोई हक नहीं
क्योंकि
वो भी एक स्त्री है .