मंगलवार, 29 मई 2012

माँ की डेहरी की याद

कभी घर की डेहरियों से
बुलाती माँ की याद
जब वो बाबू जी का
करती इंतज़ार रात भर /
और याद नज़र आती
सुबह की वो भरी-भरी
लाल आँखें , किसकी
सोचो.......
सोचो.......
याद आया ? अरे हाँ !
वो तो माँ होती थी /
आज भी दिमागों के
छल्लो में घूम रहा
वो हथपंखी , जो
माँ रात भर घुमती
और मैं बेखबर सोता ;
हर उस खबर से जो , माँ
को बहुत दूर सुनाई पड़ रही थी
जो मैं आज भी
नहीं सुन पा रहा
शायद ये वही फर्क है
जो माँ बचपन में
कभी गुस्से में , तो कभी
प्यार में ,
जताती थी ///  

तरन्नुम चार

१-; शोख हवाओं के परिंदों से
      कुछ कहना हम भूल गए
      वादी के इस नए मौसम से
      हम उड़ना 
भी आज भूल गए ///
****************************

२-; अक्स तेरा आज भी जिंदा है कहीं
     फिर भी नामो- निशा तेरा 
दिखता नहीं कहीं 
     रोज़-रोज़ चलता हूँ तेरे रूखे साथ में 
     फिर भी तेरी पैमाइश होती नहीं कहीं ..////
*******************************

३-; लोग फिर से मुकम्मल जहाँ ढूंढ़ते है
      परिंदे फिर से नए मौसम का आशियाना
ढूंढ़ते है
      पर क्यूँ हम ज़िन्दगी के नए रास्तों पर
      फिर वही पुराना करवा ढूंढ़ते है ..///
*******************************

४-; हम जिस्म के दागों की दावा करते रहे
     फिर भी नए दाग लगते रहे
     ज़िन्दगी इसी कशमोकश में रही
     मौत से भी इसकी दावा न बनी
     लोग फिर कब्र पर भी आते रहे
     अब तो मिट्टी, मिट्टी से लड़ने लगी
     दरख्तों पर भी आज दाग लगने लगे 
     ज़िन्दगी गुज़र हरने में थी लगी
     कब्र की तहों से भी 
हारने लगे ////

राही

पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की
सोच समुन्दर सा गहरा था
कर्म की रेख नापती इसको
लगता कितनी दूर चलू मैं
सोच की गहरे ढूंढ़ चलू मैं
उस कर्म रेख की गहरी स्याही
अपने जीवन पर छोड़  चलू मैं /
पग-पग मैं चलता जीवन राही
राह पकड़ अपने जीवन की ....
  

रविवार, 20 मई 2012

आकर्षण Vs प्रेम


उस आकर्षण के पीछे
कितने पल का
मौन छिपा था
शायद
उसके मन:स्थल से
यही प्रश्न उभरता था /
क्यों छन भर में
वह उच्च पटल से
निम्न सतह पर होता ?
उच्चावच का यह रेखांकन
मस्तिष्क ह्रदय
संपर्क रेखा सी
अन्तःस्थल से मुक्त गगन का
स्पर्श गान सा
था लगता ;
उसके प्रति था
यह आकर्षण
या इसे
प्रेम का गान कहू ?

आपाधापी एवम प्रेम

आँखों में तस्सुउवर
पलकों में शिकायत
उनको क्या पता ?
हमको क्या जरुरत
दो पल - दो शब्दों
से
क्या होता ?
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
साथ की
एहसास की ज़रूरत
वह ख़ुशी
कुछ पाने की
वो गम
कुछ खोने का
एक पल में
सब लुटा देने का,
और
हमेशा के लिए
लुट जाने को
कुछ भी
न पास रखने को;
और
सबकुछ पा लेने की चाहत
ये सब
मैंने भी चाहा ,
पर क्या
इस जग में
मुमकिन है?
ये सुकून
प्यार ,
एहसास ,
सब बेगाने लगते है
आज की इस
भौतिकता में ,
पता नहीं
मस्तिष्क की छड्भंगुरता
ह्रदय की अरक्तता
ये सब
कब तक ?

शुक्रवार, 18 मई 2012

पहचान का प्रश्न



तू सब्र है मेरा
तू इम्तहा है मेरा
ऐ दिल तू बता भी दे
तू क्या है मेरा ////
तू दर्द भी है
तू दवा भी है
तू लहर भी है
तू है साहिल भी
तू कशमोकश है रातों की
तू निंदिया भी है राहतों की .
कैसी है ये बेखुदी तेरी
न चाहे भी तू धडकता है
ऐ मेरे नादा दिल
क्यों तू रह-रह के बरसता है ///
ऐ दिल तू बता भी दे
तू क्या है मेरा
तू सब्र है मेरा...या...तू है इम्तहा मेरा///
♥ ♥ ♥

जीवन और आकाल


कभी दिल ये दरिया था
आज न तो दरिया है और
न ही पानी ........
न ही गहराई ....
रह गया है तो मात्र
एक छिछला सा तलहट
जिसमे न जीवन है
और न अतीत के निशान...////

मैं और तुम



सपहा सपहा जीवन से मिट
जाती है संवेदनाये, क्यों
क्यों धरातल इतना कठोर
हो जाता कि ,अगर
गिर जाये कोई तो
टूट जाता है, या
कह सकते है बिखर जाता है
संवेदनाये इतनी कमज़ोर तो
नहीं होती ...परन्तु
समय सम्बद्ध परिभाषाये
और स्वरुप बदल जातें है
जैसे मै और तुम बदल गए /

ईशा और मैं



ईशा को भी मिला था
सलीब पे कुर्बा होने का
सिला .....
मैंने भी होना चाहा कुर्बा
पर न अब वो सलीब ही रहा
और न वो खुदा ...
ऐसा नहीं कि मैं कभी
खुदा होना चाहा
पर होना चाहा उन लोगो का
जिनका खुदा होता है ...
पर न वो लोग मिले
और न मैं कुर्बा हुआ ...
धत तेरी कि .....

मोहभंग


अब नहीं मैं लौट पाऊंगा कभी
क्योकि तेरी याद में
अब प्यार सा लगता नहीं
लगता है वह केवल
सपनो का खँडहर और
उनकी कुछ टूटती दीवार जर्जर
जिस पर कभी रौशनी
और अलसाई हुई कुछ दूब होती थी ///

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए मिलकर बैठे
साथ तेरे 
बहुत दिन हुए पकड़कर बैठे 
हाथ तेरे 
बहुत दिन हुए सुलझाये तेरे उलझे 
बाल तेरे 
बहुत दिन हुए आँखों में 
डूबे तेरे 
बहुत दिन हुए देखे दिन में 
ख्वाब तेरे 
बहुत दिन ......मगर तुम कहती हो
कि अभी कल की ही तो बात है ..
पर बहुत दिन हुए//////// 

बानगी

गिर गए है शाख से पत्ते बहुत
ज़िन्दगी के ......
शायद आज फिर से तूफ़ान आया है
कही पे ........
बच गए है कुछ निशां अब
ज़िन्दगी के .....
शायद बानगी है नए पत्तो की
यहाँ पे ...

रकबा


हर रकबा था मेरा न जो 
चाह बहुत बनाना अपना 
धीरे-धीरे बना चौहद्दी 
और बनाई मेड़े भी  
सींच-सींच कर, बो कर
ख्वाबो के कुछ बीज भूरे-भूरे

रातों की नीदों को उसके आँचल  
में रखकर ,
खुली हवाओ की थपकियों से 

किया जिसे था हरा-भरा 
जैसे माँ अपने बच्चो को
पला करती 
अपने ख्वाबो की डाली पे बैठा कर
और वही डाली एक दिन जैसे
तेज़ हवाओ में तोड़ 
सारे ख्वाबो को
खुद ही पला करता है 

कुछ रकबो का ख्वाब    

मेरा रकबा वैसे ही
जो न था मेरा
ले जाता है आसामी 
मंडी और बाजारों में, और
मोला-तोला है भावो में
चाहा बहुत जिसे बनाना अपना
धीरे-धीरे बना चौहद्दी
हर रकबा था मेरा जो न //////


विकल्प

उन नाखुनो की खुरचन से 
बचना चाहा है मैंने
जिनके पंजो में
आ जकड़ा, शायद
यह विकल्प ज्यादा 
अच्छा था , क्योकि
जकड़ा जाना कम
दुष्कर है, वानस्पत
खुरचे जाने के ///////