कभी घर की डेहरियों से
बुलाती माँ की याद
जब वो बाबू जी का
करती इंतज़ार रात भर /
और याद नज़र आती
सुबह की वो भरी-भरी
लाल आँखें , किसकी
सोचो.......
सोचो.......
याद आया ? अरे हाँ !
वो तो माँ होती थी /
आज भी दिमागों के
छल्लो में घूम रहा
वो हथपंखी , जो
माँ रात भर घुमती
और मैं बेखबर सोता ;
हर उस खबर से जो , माँ
को बहुत दूर सुनाई पड़ रही थी
जो मैं आज भी
नहीं सुन पा रहा
शायद ये वही फर्क है
जो माँ बचपन में
कभी गुस्से में , तो कभी
प्यार में ,
जताती थी ///
बुलाती माँ की याद
जब वो बाबू जी का
करती इंतज़ार रात भर /
और याद नज़र आती
सुबह की वो भरी-भरी
लाल आँखें , किसकी
सोचो.......
सोचो.......
याद आया ? अरे हाँ !
वो तो माँ होती थी /
आज भी दिमागों के
छल्लो में घूम रहा
वो हथपंखी , जो
माँ रात भर घुमती
और मैं बेखबर सोता ;
हर उस खबर से जो , माँ
को बहुत दूर सुनाई पड़ रही थी
जो मैं आज भी
नहीं सुन पा रहा
शायद ये वही फर्क है
जो माँ बचपन में
कभी गुस्से में , तो कभी
प्यार में ,
जताती थी ///