शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

नवयौवन का स्वप्न

मेरे स्वप्न क्या ?
जो हर उस चेतन में
जिसमे नवयौवन है
छेड़ जाता है
क्यों एक राग
जिसकी परिधि
प्रेम है या देह
या कुछ और,
कही पिता का दबाव
तो कभी समाज
जिसमे वो जिंदा है
जो इसे बांधते है
क्यों वो
तोड़कर ये घटिया तागे
स्वप्न देखता है ?
कारण, शायद
वे स्वप्न ही
जिंदा रखते है ,
कभी स्वयं के लिए
कभी अपनों के लिए
क्यों वो "अपनों" को
पूर्ण कर पता है
और स्वयं को सती........?
गीता सब को याद है
पर "स्वयं" ध्यान नहीं
अधिकार नहीं
स्वतंत्रता बिक गई है
दास और नवयौवन  में
अंतर क्या ?

दर्द भी ज्यादा
इस नव यौवन का
लोग कहते इसे
स्वतंत्र , पर
पर इसकी साँसे
घोंट दी गई
स्वप्न आने से पहले
टूट गए
या यूँ कहे कि
तोड़ दिए गए,
प्रश्न इसका नहीं कि
यह स्वप्न
नवयौवन देह का है
या उसके प्रेम का
दर्द तो तब उठता है
जब कोई स्वप्न देखता  है
मंतव्य, तो उस स्वप्न का है
जो नवयौवन का है
जिसकी परिधि केवल 
प्रेम या देह होती
न कि गीता के वे पद
जो कहते है
आत्मा अमर है
प्रेम अमर है
तो ऐसा क्यों ,
कि
प्रेम या देह
जो नवयौवन का स्वप्न है
अमर नहीं ?
आखिर क्यों ?
प्रश्न और केवल ?
 
   

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