शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

केवल मैं और तुम

रुक कर पूँछा उनसे
एक साथ की बात
टाल जाते
जवाब का इंतज़ार
रहता , पर
शायद पता था जवाब
उनको भी और
मुझको,
परन्तु इतना ही सम्बन्ध
कि एक जवाब के
रुख पर
छोड़ दे ज़िन्दगी जीना
सपने देखना
या वो कसमे जो
ली थी तुमने या
मैंने /
सोचकर देखा तो
एक असमंजस......
एक घुमावदार चक्र
जिस पर केन्द्रित
नहीं हो पा रहा
आज मन
जानते है हम दोनों\
परिणिति को, पर
क्यों टूट जाते तुम
या मैं /
सोचकर देखा तो
यह समाज ही
यह धर्म ही
यह रिश्ते ही
जो हम बनाते
अपने आस-पास
कारक और कारण
पड़ते  है बन /
तुमसे जुड़ने से पहले
यह तो नहीं था
शायद , इन पर सोचा नहीं
पर अब टूटते वक़्त
इन पर क्यों सोचता
शायद मैं इस जुड़े
बंधन से डोर के
दोनों किनारों को भी
चाहता हूँ जोड़ना ,पर
शायद तुम कमज़ोर हो
या मैं /
एक किनारा तो जोड़ लिया
जो तुम्हारा और मेरा था , पर
मैं जानता हूँ कि
दूसरा हमारा नहीं
क्योंकि वही से
हमारी शुरुआत है
और वही हमें छोड़
देने का , अधिकारी है
न ही तुम या न ही
मैं /
तोडना तो पड़ता है
ये डोर एक दिन
सबको
पर तुम मजबूर हो
और मजबूर हूँ मैं
कि हम वादा निभा रहे
तोड़ नहीं सकते वादा
मैं और न ही तुम
तोडना चाहती हो /
क्या मेरे या हमारे
दरम्या इतना भी बल नहीं
कि तोड़ दोनों किनारे
जो जड़ से जुड़े हैं
बना ले एक घेरा
जिसकी परिधि में हो
केवल तुम और
मैं /////

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