रविवार, 26 अगस्त 2012

बाहर-अंदर

मानव , मानव से क्या
चाहता ? सिर्फ कुछ साथ
या कहू ,
कुछ और
प्रेम का औदात्य
या नफरत की
ऐसा क्यूँ ?
लोग धर्म को
जोड़ते है मानव अस्तित्व से
एक धर्म और एक धर्म
या कुछ और
या एक विरोध
नज़र क्यों नहीं आता 
लोगों को
दो नदियों की धारा
जो मिलती है
एक ही गंतव्य को
पर प्रवित्ति तो
झलकती है साफ़
वही नदी  , वही मानव
वही धारा , वही जीवन
वही गंतव्य और वही गंतव्य
पर दिखता नहीं , उन्हें 
दोनों के अन्दर का
द्वन्द , जो बाह्य प्रकार्य को
छोड़ , अन्दर से मिल जाने को
है तत्पर, हो एक //////

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