सत्ता और सत्तावादी
विकास और वायदे
ये दो साम्य शब्द है
जो न दिखते है, और
न नज़र आते है
वैज्ञानिक भाषा में
ये वर्चुअल है/
सत्ता, विकास के साथ कायम है
तो सत्तावादी, वायदों के साथ
और इनके मध्य पिसते हैं
जन और नागरिक होने के
दुरूह प्रश्न ........
जो हमारी संसद को मानती है
राष्ट्र का स्तम्भ /
जहाँ विकास के रूप में
फसाएं जाते है चुनावी पेंच
और कह दिया जाता है कि,
भारत विभिन्नताओं का देश है
जहाँ दो कदम पे भाषा
तो चार कदम पे इंसान
जाते है बदल ..../
परन्तु सत्तावादियों ने इसे
जोड़ दिया विकास से,
जिससे आज दो कदम पे
भाषाई राज्य
तो चार कदम पे पैदा हो जाते है
जातीय समीकरण ////
जिसके साथ नापी जाती है
सत्ता और वायदों की मजबूती
यू. एन . में देखना शुरू हो जाता है
देश को स्थाई रूप में,पर
सत्तावादियों ने विकास को
देखा है नए चश्मे से
जो तेलंगाना , माओवाद,
आफ्सा, दार्जिलिंग
बोफ़ोर्स से स्पेक्ट्रम के घोटाले
या भोपाल से गोधरा की परिधि
में आता है नज़र साफ़-साफ़
6 बाई 6 की आई साईट पे,
जिसमे संसद व नरीमन पॉइंट
दिखता है आत्मरक्षा की मिसाल के रूप में //,
सत्ता यहाँ उदर में भूख की आग, तो
विकास में सुरक्षा लेकर चलती है, पर
सत्तावादियों को न ही दिखाई पड़ता है
किसानो के चर्चराए खेत और
न ही कालाहांडी, आंध्र ,
महाराष्ट्र के प्यासे किसानो की फसी हुई हुंडी ///
हाल यह भी सुना है कि संविधान
जो हमारे देश में स्थापित
करता है सत्ता ,
सुनाता है उद्घोषणा कि
सत्तावादियों के हितों को
नहीं किया जा सकता संक्षिप्त
किसी भी स्थिति में....क्योंकि
सत्ता और सत्तावादी
विकास और वायदे
ये दो साम्य शब्द हैं ///////
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