जब भी निकलता हूँ
अँधेरी गलियों में
जहाँ होते हैं रात में
बहुत से जानवर
जो कुतर रहे होते हैं
वे तमाम चीज़ें
जिन्हें हमने फेंक दिया
समझ के कचरा
जिनमें खोजते हैं वे
ज़िन्दगी की आदिम-शक्ति
और हमें नहीं सुनायी पड़ती
उनकी खटर-पटर या
उनकी चीख-पुकार
सुनना चाहता हूँ आज
उन सब आवाजों को
उन सारी उठा-पटक को
ज़िन्दगी की उन तमाम
चीज़ों को रखना चाहता हूँ
सलीके से,
जिन्हें रख आये थे हम
उन खोह सी अँधेरी गलियों में
जिन पर समय एक विषैली ग्रंथि वाला
जीव है //
अँधेरी गलियों में
जहाँ होते हैं रात में
बहुत से जानवर
जो कुतर रहे होते हैं
वे तमाम चीज़ें
जिन्हें हमने फेंक दिया
समझ के कचरा
जिनमें खोजते हैं वे
ज़िन्दगी की आदिम-शक्ति
और हमें नहीं सुनायी पड़ती
उनकी खटर-पटर या
उनकी चीख-पुकार
सुनना चाहता हूँ आज
उन सब आवाजों को
उन सारी उठा-पटक को
ज़िन्दगी की उन तमाम
चीज़ों को रखना चाहता हूँ
सलीके से,
जिन्हें रख आये थे हम
उन खोह सी अँधेरी गलियों में
जिन पर समय एक विषैली ग्रंथि वाला
जीव है //
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