शनिवार, 4 जनवरी 2014

पुनरीक्षण

जब भी निकलता हूँ 
अँधेरी गलियों में 
जहाँ होते हैं रात में 
बहुत से जानवर 
जो कुतर रहे होते हैं 
वे तमाम चीज़ें
जिन्हें हमने फेंक दिया 
समझ के कचरा 
जिनमें खोजते हैं वे 
ज़िन्दगी की आदिम-शक्ति 
और हमें नहीं सुनायी पड़ती 
उनकी खटर-पटर या 
उनकी चीख-पुकार 
सुनना चाहता हूँ आज 
उन सब आवाजों को 
उन सारी उठा-पटक को 
ज़िन्दगी की उन तमाम 
चीज़ों को रखना चाहता हूँ 
सलीके से, 
जिन्हें रख आये थे हम
उन खोह सी अँधेरी गलियों में 
जिन पर समय एक विषैली ग्रंथि वाला 
जीव है //

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