सोमवार, 13 जनवरी 2014

ढिबरी

एक डिबिया 
और एक बाती
इसी के सहारे खोजते हैं 
दुनिया के छिपे हुए 
बचे हुए 
आदिम अवशेष 
जिसकी ललछौंक रोशनी में 
वो रचते हैं पिछली सदी की 
षड्यंत्रकारी पद्धतियों का 
निगमनात्मक शास्त्र
जिसमें सदियों का काजल 
होता रहता है इकठ्ठा 
परत दर परत 
और समय के विदुर उन्हें 
शमित कर देना चाहते हैं 
पवित्र जल की धार हाँथो में लेकर 
जिससे वो इतिहास की वर्तुल गति में 
चन्द्र को राहु के ग्रास तक पंहुचा सके 
और उन तमाम लोगों के 
पल्लवित होने की पहली शर्त का 
कर सके मानकीकरण,
मनुष्य होने के 
परिकल्पनात्मक सबूतों के मध्य 
इंसान एक छिपा हुआ सियार है 
जो घात लगाकर 
अपना क्षेत्र निर्धारित करता है 
जिसमें दूसरे अस्तित्व का प्रवेश निषेध है 
अन्यथा मात्र एक अनुबंध  
जीवन के समस्त अधिकार 
महापात्र को अर्पित /

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