रविवार, 26 अगस्त 2012

मनुष्य का प्रमाण-पत्र

जीवन की सार्थकता के
अर्थ दो हो जाते है आज,
और उनका अर्थ भी
दो शब्दों के साथ ही
जाता है बदल ,
जैसे सफलता और असफलता
क्योंकि आज मनुष्य का
निराकार स्वरुप
नहीं है स्वीकार्य ,
वह समाज को
चाहता है प्रदान करना
आकार ,
जिसमे वह व्यक्ति
व्यक्ति के समूह को
अपने अनुरूप कर सके
प्रमाणित .../////

बाहर-अंदर

मानव , मानव से क्या
चाहता ? सिर्फ कुछ साथ
या कहू ,
कुछ और
प्रेम का औदात्य
या नफरत की
ऐसा क्यूँ ?
लोग धर्म को
जोड़ते है मानव अस्तित्व से
एक धर्म और एक धर्म
या कुछ और
या एक विरोध
नज़र क्यों नहीं आता 
लोगों को
दो नदियों की धारा
जो मिलती है
एक ही गंतव्य को
पर प्रवित्ति तो
झलकती है साफ़
वही नदी  , वही मानव
वही धारा , वही जीवन
वही गंतव्य और वही गंतव्य
पर दिखता नहीं , उन्हें 
दोनों के अन्दर का
द्वन्द , जो बाह्य प्रकार्य को
छोड़ , अन्दर से मिल जाने को
है तत्पर, हो एक //////

इक डर

सपने देखना  मुश्किल नहीं
पर पूरा सच देखना
अपने हांथों में हो
ये मुश्किल होता , है न  !
कभी किसी ने सोचा , ये
कि साहिल भी कभी थकेगा
है न असमंजस !
रोज़ थकता हूँ मैं
सोचो किससे ?
एक मंदी सी हंसी
आप होंगे  हँसते , पर
शायद सच कहता मैं
अपने आप से
अपने मन से
अपने तन से
और सबसे ज्यादा
अपनी सोच के अधूरेपन से
सच कहता था न मैं
आखिर हंसी आ गई !!...

शनिवार, 25 अगस्त 2012

याद

आज भी याद आता
घुटनों के बल घूमना
तुम्हारा
सामानों का करीने से रखना
फिर थककर बैठ जाना
कुछ देर
फिर उठाना भड़ककर गुस्सा
होना तुम्हारा , मुझपर
और कहना मेरा नाम
अपनी तोतली जुबान से
आज भी याद आता
पैर पटक-पटक कर चलना
तुम्हारा
पल भर , में मचल जाना
कुछ पल हवाओं में नाचना
तुम्हारा
फिर हौले से अपनी बांहों
में ले , जो मुझे हर बात
से दूर ले जाती
आज भी याद आता है
सब कुछ ठीक होते हुए
गुस्सा हो तुम्हारा
सड़क पर गुस्से में
आगे चलना तुम्हारा 
फिर पीछे-पीछे मेरा आना
लड़ना कहीं भी सड़क पर
और कहना तुम्हारा
मैं अकेली चली जाउंगी
कितनी बार गई हूँ अकेले
तुम्हारी कोई जरुरत नहीं
आज भी याद आता
तुम्हारा अगली सुबह
दरवाजे पर दस्तक देना
और इक प्यारी सी
मुस्कान बिखेर देना
जो मेरी सोई हुई
आँखों में इक सुबह
की खिलखिलाती धूप
सी जाती फ़ैल
आज भी याद आता
हर ख़ुशी और हर गम
जो साथ-साथ बांटी
साथ तुम्हारे
आज भी याद आता
तुम्हारे बाँहों का कसाव
तुम्हारे होंठो की नमी
जो मुझे इस दुनिया से
दूर ले जाती है जहाँ
होती हो तुम और
याद आती तुम्हारे  बदन
की खुशबु , जो
जाने के बाद भी
मेरे तन में बसी रहती
आज भी याद आता
घंटो तुमसे बातें करना
और वक़्त का पता न चलना
ख्वाबो में डूबकर , पूरी
रात तन्हाई में गुजरना
आज भी याद आता है /
आगे भी याद आएगा
जब तुम चली जाओगी
मेरी ज़िन्दगी से दूर बहुत
और मेरा कोई निशान भी
रहेगा न तुम्हारे  इल्म में 
पर तुम न समझो , शायद
बेहतर होगा
क्योंकि तब भी याद
आओगी मुझे ,जैसे
आज भी याद आता
घुटनों के बल घूमना
तुम्हारा ....//////

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

केवल मैं और तुम

रुक कर पूँछा उनसे
एक साथ की बात
टाल जाते
जवाब का इंतज़ार
रहता , पर
शायद पता था जवाब
उनको भी और
मुझको,
परन्तु इतना ही सम्बन्ध
कि एक जवाब के
रुख पर
छोड़ दे ज़िन्दगी जीना
सपने देखना
या वो कसमे जो
ली थी तुमने या
मैंने /
सोचकर देखा तो
एक असमंजस......
एक घुमावदार चक्र
जिस पर केन्द्रित
नहीं हो पा रहा
आज मन
जानते है हम दोनों\
परिणिति को, पर
क्यों टूट जाते तुम
या मैं /
सोचकर देखा तो
यह समाज ही
यह धर्म ही
यह रिश्ते ही
जो हम बनाते
अपने आस-पास
कारक और कारण
पड़ते  है बन /
तुमसे जुड़ने से पहले
यह तो नहीं था
शायद , इन पर सोचा नहीं
पर अब टूटते वक़्त
इन पर क्यों सोचता
शायद मैं इस जुड़े
बंधन से डोर के
दोनों किनारों को भी
चाहता हूँ जोड़ना ,पर
शायद तुम कमज़ोर हो
या मैं /
एक किनारा तो जोड़ लिया
जो तुम्हारा और मेरा था , पर
मैं जानता हूँ कि
दूसरा हमारा नहीं
क्योंकि वही से
हमारी शुरुआत है
और वही हमें छोड़
देने का , अधिकारी है
न ही तुम या न ही
मैं /
तोडना तो पड़ता है
ये डोर एक दिन
सबको
पर तुम मजबूर हो
और मजबूर हूँ मैं
कि हम वादा निभा रहे
तोड़ नहीं सकते वादा
मैं और न ही तुम
तोडना चाहती हो /
क्या मेरे या हमारे
दरम्या इतना भी बल नहीं
कि तोड़ दोनों किनारे
जो जड़ से जुड़े हैं
बना ले एक घेरा
जिसकी परिधि में हो
केवल तुम और
मैं /////

नवयौवन का स्वप्न

मेरे स्वप्न क्या ?
जो हर उस चेतन में
जिसमे नवयौवन है
छेड़ जाता है
क्यों एक राग
जिसकी परिधि
प्रेम है या देह
या कुछ और,
कही पिता का दबाव
तो कभी समाज
जिसमे वो जिंदा है
जो इसे बांधते है
क्यों वो
तोड़कर ये घटिया तागे
स्वप्न देखता है ?
कारण, शायद
वे स्वप्न ही
जिंदा रखते है ,
कभी स्वयं के लिए
कभी अपनों के लिए
क्यों वो "अपनों" को
पूर्ण कर पता है
और स्वयं को सती........?
गीता सब को याद है
पर "स्वयं" ध्यान नहीं
अधिकार नहीं
स्वतंत्रता बिक गई है
दास और नवयौवन  में
अंतर क्या ?

दर्द भी ज्यादा
इस नव यौवन का
लोग कहते इसे
स्वतंत्र , पर
पर इसकी साँसे
घोंट दी गई
स्वप्न आने से पहले
टूट गए
या यूँ कहे कि
तोड़ दिए गए,
प्रश्न इसका नहीं कि
यह स्वप्न
नवयौवन देह का है
या उसके प्रेम का
दर्द तो तब उठता है
जब कोई स्वप्न देखता  है
मंतव्य, तो उस स्वप्न का है
जो नवयौवन का है
जिसकी परिधि केवल 
प्रेम या देह होती
न कि गीता के वे पद
जो कहते है
आत्मा अमर है
प्रेम अमर है
तो ऐसा क्यों ,
कि
प्रेम या देह
जो नवयौवन का स्वप्न है
अमर नहीं ?
आखिर क्यों ?
प्रश्न और केवल ?